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सरस्वती मेला

एमर्सन की कविता – प्रेम में सब देकर जीवन को अर्थ देना

 मुझे आश्चर्य होता था कि इंसान  अपने धर्म के लिए

शहीद कैसे हो सकते थे ?

मैं काँप जाता था ..

मैं अब नहीं काँपता ..

प्रेम मेरा धर्म  है

और उसके लिए मैं शहीद हो सकता हूँ ..

                        – जॉन कीट्स

कीट्स हों या ग़ालिब , इस बात से फ़र्क नहीं पड़ता कि उस शायर का नाम क्या है , वो किस समय में रहता था या कविता  का सोता उसमें किस भाषा में फूटा था | प्रेम के लिए जान दे देना हर भाषा में , हर कविता में , हर कवि के कलाम में एक पवित्र कर्त्तव्य था | पर इन पंक्तियों में जो निहितार्थ मेरे लिए ज्यादा महत्वपूर्ण  है वो उसकी वो व्याख्या, वो वचन, वो आदर्श जो कहता है कि प्रेम के लिए जीना, एक कहीं अधिक महान कर्त्तव्य है |यह हमसे ज्यादा हिम्मत मांगता है , इसे हमसे  कहीं ज्यादा ताक़त की दरकार होती है- अनंत साहस की आवश्यकता होती है अपनी अंतरात्मा के गान पर अपने सबकुछ को न्योछावर  कर देने के लिए  | उस कविता की अर्थयात्रा  पर निकलने के लिए  जो हमारे जीवन, हमारे अस्तित्व को  बड़ा करती है | प्रेम की इस अनंत रुपी यात्रा में – दो शरीरों के दैहिक मिलन से परे है आत्माओं का मिलन , वो समागम जिसमें एक आत्मा अपने से विशाल अर्थ को खोजती है , उन विचारों , उन आदर्शों को पाना चाहती है जो भव्य हैं और उसका पोषण करते हैं , जिनमें समाहित होकर वो खुद अर्थवान हो जाती है , विशाल हो जाती है | हर कार्य, हर विज्ञान, हर कला , हर चिंतन असल में प्रेम के ही रूप हैं | सत्य को बचाने और बोलने की कोशिश , वीरता और विद्रोह की हर आवाज़  , ये सब कहीं गहरे प्रेम का ही क्रियान्वन हैं | वो चुम्बकीय आकर्षण जो हमें अपनी शंकाओं से परे जाने की हिम्मत देता है – सही-गलत , सामजिक और निजी वर्जनाओं से परे जाने का साहस देता है , अपने हृदय की सबसे गहरी आवाज़ का अनुसरण करने की  देता है – वो सब प्रेम है | श्रृंगारिक और आत्मिक , सांसारिक और आध्यात्मिक – यह सब प्रेम है |

माईकल ल्युनिग की कलाकृति
 
(उपरोक्त कार्टून की के शब्द -संसार में  सिर्फ़ दो भावनाएं हैं – प्रेम और भय , सिर्फ़ दो भाषाएँ हैं -प्रेम और भय , सिर्फ़ दो क्रियाएं हैं – प्रेम और भय , सिर्फ़ दो मंतव्य हैं , सिर्फ दो कार्य शैलियाँ , सिर्फ दो कार्य प्रणालियाँ , सिर्फ़ दो परिणाम  – प्रेम और भय, प्रेम और भय  )

 

राल्फ़ वाल्डो एमर्सन पिछली सदी के अमेरिका के मूर्धन्य कवियों, विचारकों एवं लेखकों में से एक हैं | उन्होंने अमेरिकी काव्य में रूमानियत एवं सौंदर्यवाद (रोमैंटिसिज़्म ) की नींव रखी | लालित्यपूर्ण कवितायें और निबंध लिखते हुए , एमर्सन नें प्रकृति पर भी बहुत लिखा | ‘प्रेम में सब कुछ दे दो ‘ उनकी एक कविता है जो प्रेम कवितायें नाम के इस संग्रह में शामिल है | प्रेम कवितायें , विभिन्न कालखंडों और देशों के कवियों की कविताओं का संकलन है जिनके साथ किताब में सुंदर शास्त्रीय पेंटिंग्स  को भी जगह दी गयी है |

मैरी ओलिवर की कविता ‘ मोमेंट्स’ की याद दिलाती हुई यह कविता, प्रेम में सर्वस्व अर्पित कर देने की आवाज़ उठाती है | ‘अपने हृदय की पुकार का अनुसरण करो ‘ – वो आदर्श जिसे हमारे जीवन को परिभाषित करना चाहिए | पर यहाँ यह पुकार , दिल की सुनो वाला वो खोखला संदेश नहीं है जो तार्किकता और विवेक की तिलांजिली देने की बात करता है | यह उस उच्चतम विवेकशीलता को अंगीकार करने की बात है जिसमें हम विवेक और तर्क को उनके सबसे सशक्त , सत्य और चमकीले स्वरूपों में देखते हैं | जब वह हमारे भय , दूसरों से उधार ली गयी मानसिकताओं और समाज की संकीर्णताओं से मुक्त होता है | वह पुकार जो हमारी धमनियों में बहती है , जो हमें अपनी पूरी हस्ती में सुनाई पड़ती है , हर क्षण, हर वक़्त , हर उस समय जब हमारा हृदय उस सत्य को दृढ़ता से दोहराता है – हर बार जब वो धड़कता है और वो सत्य बहता है हम में , जीवन प्रवाह बनकर  | 

शायद  जो चीज़ इस कविता को एमर्सन की कलम से आने का सम्मान देती है – वो है जब यह इंसानों की , प्रेम में सम्मिलित होकर भी स्वतन्त्र होने की पैरवी करती है |पर उसके साथ ही इसका एक आयाम यह भी है कि एमर्सन ने यह अपनी पत्नी की मृत्यु के शोक से उबरने के लिए लिखी |उनके वियोग में उन्होंने एक ऐसी चीज़ को थामने की कोशिश कर रहे थे जो जीवन की एक बेरंग परछाईं थी , और कुछ नहीं | पर हम बीते हुए वक़्त को जितना अपने नंगे हाथों से रोकने की कोशिश करते हैं , हमारे हाथ उतने ही घावों से भरते जाते हैं |हम जितनी बेबसी से  किसी जा चुके इन्सान की विदा को झुठलाना चाहते हैं – यादों और उसकी निशानियों से , हम जीवन के सोते से उतना ही कटते जाते हैं | उन संकीर्ण और अधमरी चीज़ों से जीवन के स्रोत को बंद कर देते हैं | इस सन्दर्भ में, कविता की कुछ पंक्तियाँ बिलकुल नया अर्थ ले लेती हैं | (मत चाहो रोकना तुम  उसे , उसके दुशाले के किनारे से ,न ही रखो अपने पास वो गुलाब ,जो उसने फेंका हो अपनी वसंत किरीट से )

पुस्तक से साभार , चार्ल्स सिम्स की ‘टाईटेनिया का पुनर्जागरण ‘ (1896)

पर उस प्रेम का क्या जिसे स्वीकार न जाये ? जिसका उत्तर न मिले ? उन स्वप्नों का क्या जिनका वास्तिवकता से सहमेल न हो पाए ? उस जूनून का क्या जिससे सिर्फ़ एक गहरा ज़ख्म मिला हो ? सच्चे सपने और सच्चे प्रेम के आशिक इस प्रश्न का उत्तर अपने एक प्रश्न से देंगे .. उनका क्या ?  एमर्सन इनसे भी आगे जाकर एक काव्यात्मक आश्वस्ति देते हैं | प्रश्न प्रेमी का नहीं , प्रेम का था | प्रश्न विजय का नहीं था , प्रश्न था इस कोशिश में अपने सबकुछ की बाज़ी लगा देने का , खेल के रूख से बेखबर | यह सुनने में कितना भी पुराना लगे , जीवन में गंतव्य से ज्यादा अर्थवान यात्राएं होती हैं | असल खज़ाना सोना नहीं है , असल खज़ाना है कीमिया सीखकर खुद सोना हो जाना |

आखिर ईश्वर कौन है, सिवाय उस मनुष्य के जो प्रेम के लिए  , यह विश्वास करता है कि वह पूरे ब्रह्माण्ड को  अपनी हथेलियों में थाम सकता है ? और दैवीय इच्छा क्या है अगर यह नहीं – कि  ईश्वर मुस्कुराकर देखता है जब वही मनुष्य प्रेम में आकंठ डूबकर , असल में ऐसा करने में सफल भी हो जाता है ?

पढ़ें और आनंद लें –

प्रेम में सब कुछ दे दो ,

अपने हृदय का अनुसरण करो

मित्र, परिवार , अपने दिन 

धन, वैभव , ऐश्वर्य 

योजनायें , अपनी प्रेरणा और नाम का उधार 

कुछ भी मत करो इंकार 

 

वो है एक वीर स्वामी 

उस पर करो विश्वास 

पूर्ण समर्पण 

टूटे न आस 

ऊर्ध्व और ऊर्ध्व 

जैसे दोपहर का सूर्य 

अधखुले पंखों के साथ 

आधी ही बताये बात 

पर है वो देवता 

ज्ञात है उसे अपना रास्ता 

और आकाश का विस्तार ..

 

वह कभी नहीं था निर्बलों  के लिए 

हो जाएँ जो क्लांत 

उसे चाहिए वीर, ओजस्वी

शंकाओं से ऊपर , शांत 

वह देगा ईनाम 

लौटेंगे वो 

विस्तृत करके स्वयं का वितान 

उनकी गति ऊर्ध्व और ऊर्ध्व , सदैव

 

प्रेम के लिए सब कुछ दो त्याग 

वचन लो समर्पण का ,

और तुम्हारा ह्रदय होगा योग्य 

एक दृढ प्रयास और 

तुम होगे मुक्त ..

एक यायावर से स्वतंत्र 

आज , कल और हमेशा के लिए 

अपने प्रेम के होकर | 

 

अपने जीवन से बंधो अपनी प्रियतमा से 

पर विस्मय का बखान 

जब उसके हृदय में धीमे से हो 

एक गीत गुंजायमान 

तुमसे पृथक भी आनंद की उपस्थिति है 

इस सम्भावना का  ले वो संज्ञान 

उसे रहने दो स्वच्छंद !

गाने दो मुक्ति का गान !

मत चाहो रोकना तुम उसे 

उसके दुशाले के किनारे से.. 

न ही रखो अपने पास वो गुलाब 

जो उसने फेंका हो अपनी वसंत-किरीट से 

 भले ही तुमने उससे किया हो प्रेम  

ऐसे जैसे करता है कोई अपनी महती छवि से 

और उसके वियोग से मद्धिम हो जाता उजास 

खींच लेता संसार से  जीवन प्रवास ,

अपने हृदय की गहराइयों में जानो ..

जब अर्ध -देवता जाते हैं 

तब देवता पधारते हैं …

पढ़ें इसके साथ खलील जिब्रान की प्रेम के उन्मुक्त आकाश की कविता , जो संयोगवश इस संग्रह का भी हिस्सा है और शोक को बेहतर समझने के लिए रिल्के का यह संवेदनशील पत्र |

 
(एमर्सन की कविता का अंग्रेजी से अनुवाद- शुभांगी मिश्र)

 

( कविता की समझ और अनुवाद में मार्गदर्शन के लिए प्रोफेसर नीता पाण्डेय का बहुत आभार )

 

 

BP

छोटे ख्याल की बंदिश सा एक गाना

माटी-बानी मिटटी की ही आवाज़ है | वही मिटटी जो हजारों साल पुरानी होते हुए भी, आज भी उर्वर है |

...

साजन ये मत जानियो तोहे बिछड़त मोहे को चैन।
दिया जलत है रात में और जिया जलत बिन रैन।।

प्रेम और विरह की यह भाषा अमीर खुसरो के समय से ज़्यादा बदली नहीं है | इनको साथ में पिरोती आई है संगीत की डोर जो मानव इतिहास में कहीं भी टूटी नहीं है | भारतीय शास्त्रीय संगीत में यह माना जाता है कि एक प्रतिष्ठित कलाकार को रियाज़ करते हुए तीन सप्तक को आसानी से साध लेना चाहिए | मंद्र सप्तक के पंचम ( नीचे के सात सुरों के मध्य ) से लेकर मध्य सप्तक से होते हुए तार सप्तक के पंचम तक (ऊपर के सप्तक के मध्य  तक ) | मेरा मानना है कि इसका अर्थ है कि एक कालजयी कलाकार अपने वर्तमान में रहते और रचते हुए , अतीत की  तरफ हाथ बढ़ाकर, प्रेरणा लेता है और भविष्य तक को सौन्दर्य के उजास से भर देता है | मंद- मध्य से तार तक जाता है | क्योंकि जड़ें गहरी होने का क्या अर्थ है जब तक हमारी कोपलें और फूल आकाश को आच्छादित न कर दें ?

माटी बानी गायिका निराली कार्तिक और संगीतज्ञ कार्तिक शाह की एक पहल है जिसमें वे भारतीय फ्यूज़न संगीत बनाते हैं | उन्होंने वैश्विक स्तर पर कई देशों के संगीतज्ञों की सहभागिता से काम किया है जिसमें वो न्यू यॉर्क के ट्रेन स्टेशन से लेकर बर्लिन की सड़कों तक पर गाते और झूमते दिखाई देते हैं |भारतीय संगीत परंपरा से विचार और आकार लेते हुए , उसे समसामयिक और प्रगतिशील बनाते हैं |दुर्लभ वाद्य-यंत्रों के साथ वे अलग भाषाओँ के साथ भी प्रयोग करते हैं | उनके गानों में अपनी कला के प्रति इतना प्रेम और कुछ नया करने की इतनी ख़ुशी होती है कि यह उल्लास आपको भी भीतर तक भिगो जायेगा |

अभी कोविद -19 की महामारी के बीच उन्होंने अन्तराष्ट्रीय कलाकारों के साथ मिलकर एक गाना तैयार किया है | सिन्दूरी नाम का यह गाना एक छोटे ख्याल की बंदिश की तरह अपनी पंखुडियां खोलता है | राग शहाना में बंधा यह गाना विरह की वही पुकार है जो अमीर खुसरो के सीने में सांसें लेती थी ..

सावन की मध्य-युगीन लघु – कलाकृति ( मिनिएचर )

स्पेन की ओडिसी नृत्यांगना पैट्रीशिया सल्गाडो और सरोद वादक जोर्डी प्रैट्स और बर्लिन की  चेलिस्ट मार्टिना बेर्तोनी  ने साथ आकर यह दिखा दिया कि कला ,और कुछ सुंदर बनाने की इंसानी चाह को कोई लॉक डाउन रोक नहीं सकता ..

इस गीत के  बोल भी पारम्पिक छटा लिए हुए हैं ..

सिन्दूरी 

सिन्दूरी ढली साँझ री

रतिया भई बिरहा भरी

तेरे नाम की लगी आस री

सिन्दूरी ढली सांझ री

चुनरी भी धानी अंग  लगाये 

बिछिया भी अंगुली में डस-डस जाये 

 

काली – नीली चूड़ियों से बईयाँ सँवारी 

बाँधूं मैं पनवा में मीठी सुपारी 

फुलवा मंगावो कोई गजरा लगावो 

माथे की चाँदन की बिंदिया सजावो

नाचूँ आज री !

झिर -मिर झिर -मिर बरसे राग यमन 

छूके सुरमयी हो गयी आज पवन 

सिन्दूरी ढली सांझ री ….

सुनें और आनंद लें …..

आप में शायद कुछ लोग पहचान पाएँ , यह वही कलाकार हैं जिनका लॉक -डाउन का ही दूसरा विडियो ‘ कर्पूरगौरं’ बहुत प्रसिद्द हुआ है | इसमें  इन्होने 9 देशों के कलाकारों के साथ मिलकर काम किया है  |

माटी-बानी मिटटी की ही आवाज़ है | वही मिटटी जो हजारों साल पुरानी होते हुए भी, आज भी उर्वर है | उसी मिट्टी को जानने के लिए माटी- बानी के बगीचे में भी घूम आइये, जो बहुत तरह के  सुरीले फूलों और पौधों से लहकता है | 

उनका  प्रेम पर लिखा गया काव्यात्मक गीत , ढाई आखर नाम ; मल्हार के लिए लिखा गया प्रेम पत्र ; बूंदन -बूंदन , प्रियतम को मनाने के लिए  ( हिंदी और फ्रेंच में ) लिखा गया   बलमा और  मोहब्बत से चमकता सूफियाना  रंग -रंगिया – ये सब सुनिए और देखिये कैसे मोहब्बत और कला में दूरियाँ और किसी भी तरह की सीमाएं अर्थहीन होती जाती हैं | 


BP

एक छोटा लड़का , एक घोड़ा , एक छछूंदर और एक लोमड़ी – उनकी दोस्ती और दुनिया बचाने की कवायद

" तुम बड़े होकर क्या बनना चाहते हो ?"

"दयालु " - लड़के ने कहा |

...

‘बहुत मैला है ये सूरज

किसी दरिया के पानी में

उसे धोकर सुखाएं फ़िर..

.. यूँ लग रहा है 

अपनी ये दुनिया 

जो सदियों की विरासत है 

जो हम सब की अमानत है 

पुरानी हो गयी है 

इसमें अब थोड़ी मरम्मत की ज़रूरत है ‘

                                                   – निदा फाज़ली 

बड़े होने के साथ-साथ हमें अपनी बचपन की चमकीली दुनिया काफ़ी टूटी – फूटी और बेरंग दिखाई देती है | ऐसी दुनिया जिसके कोने उधड़ रहे हों , जिसपर धब्बे हों, जिसकी रौशनी कहीं गुम हो गयी हो | इसको  बदलने का विश्वास और हिम्मत भी हमें बचपन से मिलती है – वो जादुई जगह जहाँ सब कुछ संभव होता है , जहाँ रंगों पर भरोसा होता है | पर दुनिया की मरम्मत की सबसे पहली शर्त है कि हम ख़ुद की मरम्मत कर पाएँ | आखिर हम भी अपनी दुनिया से उतने अलग तो नहीं , हम भी उतने  ही थके हुए , दरारों के साथ जीते और कोनों से चटके होते हैं – उसी दुनिया की तरह जिसमें हम रहते हैं | जितने प्यार से और विश्वास से हम दुनिया को बचाना चाहते हैं , उतने ही ( या उससे थोड़े से  ज्यादा ) प्यार और विश्वास से हमें ख़ुद को बचाना होता है |

चार्ली मैकेसी एक बहुत प्यारे चित्रकार और कार्टूनिस्ट  हैं जिन्होंने दशकों लम्बे अपने कार्य में कई बड़े प्रकाशनों और अख़बारों के लिए इलस्ट्रेशन ( कलात्मक चित्रण ) किया है | हाल ही में उनकी एक नई किताब आई है , जो उनके सबसे लोकप्रिय किरदारों की कहानी कहती है | एक छोटा लड़का, एक घोड़ा ( जो पहले उड़ सकता था !) , एक छछूंदर और एक लोमड़ी – ये सब संयोग से मिलते हैं और साथ में रोमांचक यात्राएं करते हैं | इस तरह  शुरू होती है दोस्ती और मानवीय रिश्तों के गर्माइश की एक कहानी जो अकेलेपन , सफलता , प्रेम , हौसले  और उन सब चीज़ों की बात करती है जिनके बारे में इन चारों दोस्तों  को सीखना ज़रूरी होता है | इनके साथ सफ़र करते -करते , चार्ली बहुत प्यार से हमारा हाथ  पकड़कर हमको भी  इन सीखों में शामिल कर लेते हैं |

सुंदर ,पनीले से बहते यह कार्टून कब किताब से बाहर निकलकर आपके साथ चलने लगेंगे , आपको पता भी नहीं लगेगा ..

 

‘द बॉय , द मोल , द फ़ॉक्स एंड द हॉर्स ‘ से साभार

“ख़ुद के प्रति दयालु होना , संसार की सबसे बड़ी दयालुता है .”- छछूंदर ने कहा |

 

‘द बॉय , द मोल , द फ़ॉक्स एंड द हॉर्स ‘ से साभार

” तुम बड़े होकर क्या बनना चाहते हो ?”

“दयालु ” – लड़के ने कहा |

मनोविज्ञान का मानना है कि हम सबके अन्दर एक बच्चा रहता है जिसे ज़रूरत होती है प्यार  और आश्वासन की |वह  दुनिया को उन्ही नज़रों से देखता है जैसे हम अपने बचपन में देखते थे | और वो बच्चा ज़्यादातर डरा रहता है, यह स्वीकार करना हमारे लिए बहुत  मुश्किल होता है  |नज़रंदाज़ किया गया  यही डर हमारे जीवन के हर हिस्से में रिस आता है और  हमें हर उस चीज़ से दूर करता जाता है जो हमें प्यारी होती है …

‘द बॉय , द मोल , द फ़ॉक्स एंड द हॉर्स ‘ से साभार

“ज़्यादातर छछूंदरों जिनको मैं जानता हूँ , आज अफ़सोस करते हैं कि काश उन्होंने अपने डर से ज्यादा अपने सपनों की सुनी होती |”

‘द बॉय , द मोल , द फ़ॉक्स एंड द हॉर्स ‘ से साभार

“सोचो ! हम कैसे होते अगर हम थोड़ा कम डरते?”

चार्ली का मानना है कि इन डरावनी ,अँधेरी राहों से लड़ने का एक ही तरीका है – हमारे दोस्त और उनका प्यार| 

‘द बॉय , द मोल , द फ़ॉक्स एंड द हॉर्स ‘ से साभार

” कभी- कभी मुझे लगता है मैं  खो गया हूँ “- लड़के ने कहा |

” मुझे भी ,” छछूंदर ने कहा ,”पर हम तुमसे प्यार करते हैं , और प्यार तुम्हे वापस घर ले आता है.”

‘द बॉय , द मोल , द फ़ॉक्स एंड द हॉर्स ‘ से साभार

“हम सब थोड़ा डरे हुए हैं ” – घोड़े ने कहा |

” पर साथ में , हमारा डर कम हो जाता है “

दोस्तो के साथ चलते हुए , हम अक्सर कमज़ोर पड़ते हैं | तब हमें ज़रूरत होती है इन्ही दोस्तो की मदद की ,पर यह काम इतना आसान नहीं होता | अपने गर्व को मार-कर , मसलकर यह स्वीकार करना कितना मुश्किल होता है कि हम अब आगे नहीं चल सकते ? यह काम हम वयस्कों को , बच्चों की तुलना में ज्यादा मुश्किल लगता है | ऐसे ही कारणों से, ज़िन्दगी के तरीकों में बच्चे , हमसे बेहतर साबित होते हैं.. 

‘द बॉय , द मोल , द फ़ॉक्स एंड द हॉर्स ‘ से साभार

“तुमने आज तक सबसे ज़्यादा बहादुरी वाली बात क्या कही है ?”, लड़के ने पूछा |

“मुझे मदद चाहिए ” , घोड़ा बोला |

‘द बॉय , द मोल , द फ़ॉक्स एंड द हॉर्स ‘ से साभार

“मदद मांगने का यह मतलब नहीं हार मानना नहीं होता है ” घोड़ा बोला |

“इसका मतलब  हार मानने से इनकार करना होता है “

और बिलकुल इतने ही सीधे -सादे तरीके से, शायद मेरी ज़िन्दगी की सबसे खूबसूरत बात ,चार्ली ने कह दी |

इस किताब की यही सबसे सुंदर बात है , यह बच्चों के लहजे में बहुत अर्थवान बात कह जाती है | दोस्तो को इसने जिंदगी में बहुत अहम् जगह दी है , पर ख़ुद से ऊपर नहीं | खलील जिब्रान ने कहा था – मुझे तब अपनी आत्मा से घृणा हुई जब मैंने उसे एक लंगड़े के सामने लंगड़ाते देखा |चार्ली की संवेदनशील कलम नीचे के चित्र में उस दर्द को जज़्ब कर लेती है , जो हम महसूस करते हैं , हर बार जब हम ख़ुद को कमतर कर लेते हैं कि हमारे दोस्त हमारे साथ ज़्यादा सहज महसूस करें | जब हम ऐसे लोगों से घिरे होते हैं जो सफलता का जश्न मनाने के बजाय उससे द्वेष करना ज़्यादा पसंद करते हैं ..

‘द बॉय , द मोल , द फ़ॉक्स एंड द हॉर्स ‘ से साभार

“मैंने तुमसे एक बात छुपाई है ” , घोड़ा बोला 

“वो क्या है ?” लड़के ने कहा 

“मैं उड़ सकता हूँ . पर मैंने उड़ना छोड़ दिया क्योंकि इससे दूसरे घोड़े जलते थे |”

इन रेखाओं में चार्ली ने खूब सारी मोहब्बत के साथ खूब सारी सच्चाई भी भरी है | शायद इसी कारण ये ज़िन्दा होकर  अपने अर्थ के साथ पन्नों में तरलता से बहती हैं..

पर शायद जो सबसे ज़रूरी चीज़ इस किताब के पन्नों में छिपी है वो है एक टूटे दिल की मरम्मत की तरकीब | 

‘द बॉय , द मोल , द फ़ॉक्स एंड द हॉर्स ‘ से साभार

“हम क्या करते हैं जब हमारे दिलों में दर्द होता है ?” ,लड़के ने पूछा |

” हम उन्हें दोस्ती , साझा आंसुओं और वक़्त में लपेट लेते हैं , जब तक वो फ़िर से उम्मीद और ख़ुशी से नहीं भर जाते “

ख़ुद को बचाने के इतने पुख्ता इन्तेजाम मुहैया करने कि वजह से ही मुझे यह किताब दुनिया बचाने की मुहिम शुरू करती दिखाई देती है | एक दिल का ख़ुशी और उम्मीद से भरना, पूरी दुनिया के एक  छोटे से हिस्से में उम्मीद और ख़ुशी का भर जाना है | पूरी दुनिया की  नाउम्मीदी का थोड़ा कम हो जाना है |

अगली बार जब आप खुद को ( और दुनिया को )  बचाते -बचाते थोड़ा थक जाएँ और कोई चीज़ ख़त्म होते महसूस करें  तो मेरी ही तरह , चार्ली के कहने पर, पीछे  मुड़कर देखिएगा ..

‘द बॉय , द मोल , द फ़ॉक्स एंड द हॉर्स ‘ से साभार

अंत 

देखो ! हम कितना आगे आ चुके हैं ..

चार्ली की इस करिश्माई दुनिया का हिस्सा बनने के लिए आप उनको इन्स्टाग्राम पर फ़ॉलो कर सकते हैं |

चार्ली मैकेसी इन्स्टाग्राम 

(किताब के अंश का अंग्रेजी से अनुवाद – शुभांगी मिश्र )

BP

लोकतंत्र के हिज्र में लिखी गयी फ़राज़ की ग़ज़ल

जैसे तुझे आते हैं न आने के बहाने

ऐसे ही किसी रोज़ न जाने के लिए आ

...

ग़ज़ल शब्द का मतलब होता है – ‘ आशिक और माशूक की बातचीत ‘, मोहब्बत के नाम एक पैगाम | पर मोहब्बत शब्द का अपने में कोई मानी नहीं होता , वो तो करने वाले पर होता है कि वो इस लफ्ज़ को कितनी आबरू बख्श सकता है , इसके मानी के आकाश को  हाथ बढ़ाकर और कितना ऊँचा कर सकता है | बेशक इसका विपरीत भी सच है , इसलिए मोहब्बत लफ्ज़ से जुड़ी जितनी कमज़र्फ़ बातें हम सुनते हैं , वह मोहब्बत करने वालों की  होती  हैं ख़ुद मोहब्बत की नहीं  , तमाम कमज़ोर आशिकों और माशूकों के जो इस लफ्ज़ के  मानी को बहुत छोटा कर देते हैं | 

अहमद फ़राज़ एक बेहद मशहूर शायर रहे हैं जिन्होंने अपनी क़लम से इस कदर तक इश्क किया कि उसे हमेशा सच कहने के लिए इस्तेमाल किया | पाकिस्तान के क्रन्तिकारी शायर , आम जनता के दुःख, दर्द और मजबूरियां इनकी कलम और कागज़ पर धड़कते थे | अगर आप फ़राज़ नाम से न भी वाकिफ़ हों तब भी यह बहुत मुमकिन है कि आप इनकी सबसे मशहूर ग़ज़ल से ज़रूर वाकिफ़ होंगे | ‘रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ , आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ ‘ दशकों से अधूरी मोहब्बत के दर्द बयाँ करती आई है | पर क्योंकि फराज़ ग़ज़ल के सच्चे आशिक थे , उनकी ग़ज़ल का क़द इतना बड़ा था कि ज़मीन से निकलकर वो आसमां को छू लेती थी | यह अब भी मोहब्बत का पैगाम  ही  थी पर आशिक और माशूक़ कुछ अलग थे |

अहमद फ़राज़

‘आज के प्रसिद्द शायर’ श्रृंखला की  किताब के प्राक्कथन में संपादक कन्हैयालाल नंदन , जो कि ख़ुद एक प्रसिद्द कवि- संपादक हैं इस ग़ज़ल की बात करते हैं | वे कहते हैं –

वतन से दूरी में अपनों की मोहब्बत  और उनसे  बिछड़ जाने का ग़म अहमद फ़राज़ का पसंदीदा विषय है |

उनकी मशहूर ग़ज़ल , रंजिश ही सही ,  उसी ग़म को आवाज़ देने वाली ग़ज़ल है जिसे कुछ लोग इश्क के रूमानी पहलू से जोड़ कर देखते हैं और आगे बढ़ जाते हैं | लेकिन बकौल फ़राज़ यह ग़ज़ल पाकिस्तान से बार-बार रूठ कर चली जाने वाली जम्हूरियत ( डेमोक्रेसी ) को  मुख़ातिब मानकर कही गयी है |

अपने देश के हालात देखकर वो तड़प थी जिन्होंने उनसे यह शाहकार ग़ज़ल लिखवाई | उनकी लेखनी , तमाम ग़ज़लों और नज़्मों से फ़राज़ एक ऐसी तरक्कीपसंद शायरी की नुमाइंदिगी करते हैं जो आशिक़ -माशूक, हुस्न-इश्क़, हिज्र -वस्ल की बात करते हुए भी इनसे बहुत बड़े मसलों की बात करती है | अवाम की हालात से कला अलग नहीं , यह उनका यकीन भी था और हमारे लिए उनकी  सीख भी |

पढ़ें इस रूमानी ग़ज़ल को दोबारा , एक नए नज़रिये से और महसूस कीजिये उस तड़प को जो नाइंसाफी के खिलाफ़ हम सबके दिलों में सुलगती है …

रंजिश ही सही , दिल ही दुखाने के लिए आ 

आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ 

कुछ तो मेरे पिन्दारे-मुहब्बत का भरम रख 

तू भी तो कभी मुझको मनाने के लिए आ 

पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो

रस्मो-रहे-दुनिया ही निभाने के लिए आ 

किस- किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम 

तू  मुझसे  खफ़ा  है  तो  ज़माने  के  लिए आ 

एक उम्र से हूँ लज़्ज़ते -गिरिया से भी महरूम 

ए  रहते -जाँ  मुझको  रुलाने  के  लिए  आ 

अब तक दिले-खुशफ़हम को तुझसे हैं उम्मीदें 

ये   आखिरी शमएं   भी  बुझाने  के   लिए आ 

माना की मुहब्बत का छुपाना है मुहब्बत 

चुपके से किसी रोज़ जताने के लिए आ 

जैसे  तुझे  आते  हैं  न  आने  के बहाने 

ऐसे ही किसी रोज़ न जाने के लिए आ  

इस ग़ज़ल की सबसे मशहूर अदायगी ग़ज़ल सम्राट मेहंदी हसन साहब की आवाज़ में है 

पर आज अपने इसे नई नज़रों से पढ़ा है तो एक नई आवाज़ में सुन भी लीजिये | पेश है अली सेठी की  दिलकश अदायगी …

BP

जीवन की हार और हौसले पर नीरज

छिप-छिप अश्रु बहाने वालों!
मोती व्यर्थ बहाने वालों!
कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है।

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मुझे कभी – कभी महसूस होता है कि मेरी मम्मा ने मुझे सिर्फ़ कहनियों और कविताओं पर बड़ा किया | ख़ुशी में कहानियों का इनाम और मुश्किल वक्तों  में कविताओं में नसीहत – मेरे बचपन में साहित्य मेरा उतना ही अच्छा दोस्त था जितनी मम्मा खुद थीं | 

जब – जब जीवन में मैं हतोत्साहित होने के करीब आती थी  , मम्मा मुझे यही कविता सुनाती थीं |और इस   कविता ने हमेशा मुझे थाम लिया है | कभी – कभी अपने पूरे जीवन से कीमत अदा करने पर भी  हम अपने सपनों की पूरी कीमत नहीं चुका पाते | तब यह समझना बहुत आवश्यक होता है कि स्वप्न कितना भी विशाल क्यों न हो जाए , जीवन के वितान से छोटा ही होता है | हम सब अपने बचपन में एक आशावाद लेकर बड़े होते हैं जो मासूम होने के साथ -साथ थोड़ी खोखली भी होती है | हमें लगता है कि दुनिया सुंदर है और जीवन बहुत प्यारा क्योंकि हमने इन दोनों की नकारात्मक उदासियों से बहुत दूर अपनी नादानी में सुरक्षित रहते हैं | जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं और दुनिया को उसके  तमाम अंधेरों के साथ देखते हैं ,हम अपनी इस नादान समझ को  एक परिपक्व आशवाद से बदल सकते हैं | वो सकारात्मकता जो तमाम विसंगतियों से भरे इस जीवन में भी, इसके  सौन्दर्य और संभावनाओं  में विश्वास  करती है |  शायद यही समझ और स्वीकार्यता हमें सपने के चकनाचूर हो जाने पर भी , जीवन के लिए, एक बार फिर प्रयास करने के लिए प्रेरित करती है | वह सकारात्मकता जो खुशनुमा होते हुए भी ठोस होती , हलकी नहीं , हमारी जीवन जीकर और दुनिया देखकर अर्जित की हुई होती है | जिसके होते हुए अगर असंख्य स्वप्न मर भी जाएँ, तब भी जीवन अपनी पूरी आभा में जीवित रहता है |

पढ़ें गोपालदास नीरज की यह कविता जो यथार्थ की धरती पर खड़ी होकर भी आशा और उम्मीद की रौशनी बुनती है –

छिप-छिप अश्रु बहाने वालों!
मोती व्यर्थ बहाने वालों!
कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है।
सपना क्या है, नयन सेज पर,
सोया हुआ आँख का पानी,
और टूटना है उसका ज्यों,
जागे कच्ची नींद जवानी,
गीली उमर बनाने वालों!
डूबे बिना नहाने वालों!
कुछ पानी के बह जाने से, सावन नहीं मरा करता है।
माला बिखर गयी तो क्या है?
खुद ही हल हो गयी समस्या,
आँसू गर नीलाम हुए तो,
समझो पूरी हुई तपस्या,
रूठे दिवस मनाने वालों!
फटी कमीज़ सिलाने वालों!
कुछ दीपों के बुझ जाने से, आँगन नहीं मरा करता है।
खोता कुछ भी नहीं यहाँ पर,
केवल जिल्द बदलती पोथी,
जैसे रात उतार चांदनी,
पहने सुबह धूप की धोती,
वस्त्र बदलकर आने वालों!
चाल बदलकर जाने वालों!
चन्द खिलौनों के खोने से बचपन नहीं मरा करता है।
लाखों बार गगरियाँ फूटीं,
शिकन न आई पनघट पर,
लाखों बार किश्तियाँ डूबीं,
चहल-पहल वो ही है तट पर,
तम की उमर बढ़ाने वालों!
लौ की आयु घटाने वालों!
लाख करे पतझर कोशिश पर उपवन नहीं मरा करता है।
लूट लिया माली ने उपवन,
लुटी न लेकिन गन्ध फूल की,
तूफ़ानों तक ने छेड़ा पर,
खिड़की बन्द न हुई धूल की,
नफरत गले लगाने वालों!
सब पर धूल उड़ाने वालों!
कुछ मुखड़ों की नाराज़ी से दर्पन नहीं मरा करता है।

प्रेरणा पाने के उपाय 1.एक चुनौती ढूँढें 2. उसपर काम करें 3. परिणाम में अपनी ख़ुशी तलाशें 4. नई चुनौती की खोज में आगे बढ़ जाएँ .. राम्या श्रीराम की ‘द टैप ‘ से साभार

BP

ख़ुद से प्रश्न करने की अनिवार्यता – शिम्बोज़्का

हमारे सौर-मंडल के इस तृतीय गृह पर 

पशुता की निशानियों में 

एक साफ़ अंतरात्मा प्रथम है .. 

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प्रश्न है कि हमें मनुष्य क्या बनाता है | हमेशा से यही प्रश्न रहा है और हमेशा यही रहेगा | पर यह प्रश्न जितना विराट लगता है , इसके उत्तर उतने ही छोटे और ग़ैर- ज़रूरी से लगते हुए हमें मिल सकते हैं | जो चीजें  हमें मनुष्य बनाती हैं वो हमेशा उतनी शानदार और भव्य नहीं होती जितना हम चाहते हैं | जैसे – जैसे हम जीवन जीना सीखते जाते हैं , हमें एहसास होता है कि किसी भी उत्तर से ज़्यादा प्रश्न  करने की यह प्रक्रिया महत्वपूर्ण  है | 

 मैंने हमेशा माना है कि इंसानी सभ्यता तब शुरू हुई जब मनुष्य ने अपने हाथ में पत्थर की जगह तर्क लिए | पर साथ ही साथ मैं मनुष्य- विज्ञान की विदुषी मार्गरेट मीड के भी कथन से पूरी तरह से इत्तेफ़ाक रखती हूँ जब उन्होंने कहा था कि असल इंसानी सभ्यता का आरम्भ तब हुआ जब इन्सान ने स्वार्थ से ऊपर उठकर दूसरों के बारे में सोचना शुरू किया |

ख़ुद के विचारों , कर्म और प्रतिकर्मों पर प्रश्न करना उस प्रक्रिया का अहम् हिस्सा है जिसने हमें क्रूरता की गहराई से बचाने में मदद की है |वो असंख्य प्रश्न जो हमें मनुष्यता की कसौटी पर खुद को परखने के लिए मजबूर करते हैं , उन तमाम रेत के कणों जैसे हैं जो घिसकर हमें बेहतर बनाते हैं  | इन प्रश्नों के सामने खुद को बौना महसूस करते हुए हम, अपनी पूरी मनुष्यता में प्रज्ज्वल रहते हैं |

आज के इस कठिन समय में , जब हम सब अप्पने घरों में बंद हैं और हमारे छोटे कार्य भी एक बड़ा महत्व रख रहे हैं , ये बहुत ज्यादा ज़रूरी है कि प्रश्न करने की इस अनिवार्यता को समझें, बेहतर तरीके से आत्मसात करें और उसका थोड़ा ज्यादा सम्मान करें |

पढ़ें पोलिश नोबेल विजेता और मेरी पसंदीदा कवयित्रियों  में से एक , विस्लावा शिम्बोज़्का की  यह कविता   –

ग्लानि के पक्ष में एक आवाज़

चील कभी नहीं कहती कि दोष उसका है 

और ख़ुद पर संदेह के लिए तेंदुए के मन में कोई जगह नहीं 

पिरान्हा मछली बिना किसी शर्म के वार करती है 

और अगर सांप के हाथ होते तो उन्हें वो सबसे साफ़ ही लगते 

एक सियार को पश्चाताप से क्या ?

और शेर और जुएँ अपने शिकार को छोड़ते नहीं 

और छोडें भी क्यों ? जब उन्हें पता है कि  वो सही हैं 

किसी भी शक की गुंजाईश से परे ..

किलर व्हेल के हृदय होते हैं काफी वज़नी

पर उनपर कभी किसी ग्लानि का बोझ नही होता 

हमारे सौर-मंडल के इस तृतीय ग्रह पर 

पशुता की निशानियों में 

एक साफ़ अंतरात्मा प्रथम है .. 

मंजीत बावा की पेंटिंग

(शिम्बोज़्का की कविता का अंग्रेजी से अनुवाद- शुभांगी मिश्र )

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