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सरस्वती मेला

एमर्सन की कविता – प्रेम में सब देकर जीवन को अर्थ देना

...

 मुझे आश्चर्य होता था कि इंसान  अपने धर्म के लिए

शहीद कैसे हो सकते थे ?

मैं काँप जाता था ..

मैं अब नहीं काँपता ..

प्रेम मेरा धर्म  है

और उसके लिए मैं शहीद हो सकता हूँ ..

                        – जॉन कीट्स

कीट्स हों या ग़ालिब , इस बात से फ़र्क नहीं पड़ता कि उस शायर का नाम क्या है , वो किस समय में रहता था या कविता  का सोता उसमें किस भाषा में फूटा था | प्रेम के लिए जान दे देना हर भाषा में , हर कविता में , हर कवि के कलाम में एक पवित्र कर्त्तव्य था | पर इन पंक्तियों में जो निहितार्थ मेरे लिए ज्यादा महत्वपूर्ण  है वो उसकी वो व्याख्या, वो वचन, वो आदर्श जो कहता है कि प्रेम के लिए जीना, एक कहीं अधिक आवश्यक कर्त्तव्य है |यह हमसे ज्यादा हिम्मत मांगता है , इसे हमसे  कहीं ज्यादा ताक़त की दरकार होती है- अनंत साहस की आवश्यकता होती है अपनी अंतरात्मा के गान पर अपने सबकुछ को न्योछावर  कर देने के लिए  | उस कविता की अर्थयात्रा  पर निकलने के लिए  जो हमारे जीवन, हमारे अस्तित्व को  बड़ा करती है | प्रेम की इस अनंत रुपी यात्रा में – दो शरीरों के दैहिक मिलन से परे है आत्माओं का मिलन , वो समागम जिसमें एक आत्मा अपने से विशाल अर्थ को खोजती है , उन विचारों , उन आदर्शों को पाना चाहती है जो भव्य हैं और उसका पोषण करते हैं , जिनमें समाहित होकर वो खुद अर्थवान हो जाती है , विशाल हो जाती है | हर कार्य, हर विज्ञान, हर कला , हर चिंतन असल में प्रेम के ही रूप हैं | सत्य को बचाने और बोलने की कोशिश , वीरता और विद्रोह की हर आवाज़  , ये सब कहीं गहरे प्रेम का ही क्रियान्वयन हैं | वो चुम्बकीय आकर्षण जो हमें अपनी शंकाओं से परे जाने की हिम्मत देता है – सही-गलत , सामजिक और निजी वर्जनाओं से परे जाने का साहस देता है , अपने हृदय की सबसे गहरी आवाज़ का अनुसरण करने की  आज्ञा देता  है – वो सब प्रेम है | श्रृंगारिक और आत्मिक , सांसारिक और आध्यात्मिक – यह सब प्रेम है |

माईकल ल्युनिग की कलाकृति
 
(उपरोक्त कार्टून की के शब्द -संसार में  सिर्फ़ दो भावनाएं हैं – प्रेम और भय , सिर्फ़ दो भाषाएँ हैं -प्रेम और भय , सिर्फ़ दो क्रियाएं हैं – प्रेम और भय , सिर्फ़ दो मंतव्य हैं , सिर्फ दो कार्य शैलियाँ , सिर्फ दो कार्य प्रणालियाँ , सिर्फ़ दो परिणाम  – प्रेम और भय, प्रेम और भय  )

 

राल्फ़ वाल्डो एमर्सन पिछली सदी के अमेरिका के मूर्धन्य कवियों, विचारकों एवं लेखकों में से एक हैं | उन्होंने अमेरिकी काव्य में रूमानियत एवं सौंदर्यवाद (रोमैंटिसिज़्म ) की नींव रखी | लालित्यपूर्ण कवितायें और निबंध लिखते हुए , एमर्सन नें प्रकृति पर भी बहुत लिखा | ‘प्रेम में सब कुछ दे दो ‘ उनकी एक कविता है जो प्रेम कवितायें नाम के इस संग्रह में शामिल है | प्रेम कवितायें , विभिन्न कालखंडों और देशों के कवियों की कविताओं का संकलन है जिनके साथ किताब में सुंदर शास्त्रीय पेंटिंग्स  को भी जगह दी गयी है |

मैरी ओलिवर की कविता ‘ मोमेंट्स’ की याद दिलाती हुई यह कविता, प्रेम में सर्वस्व अर्पित कर देने की आवाज़ उठाती है | ‘अपने हृदय की पुकार का अनुसरण करो ‘ – वो आदर्श जिसे हमारे जीवन को परिभाषित करना चाहिए | पर यहाँ यह पुकार , दिल की सुनो वाला वो खोखला संदेश नहीं है जो तार्किकता और विवेक की तिलांजिली देने की बात करता है | यह उस उच्चतम विवेकशीलता को अंगीकार करने की बात है जिसमें हम विवेक और तर्क को उनके सबसे सशक्त , सत्य और चमकीले स्वरूपों में देखते हैं | जब वह हमारे भय , दूसरों से उधार ली गयी मानसिकताओं और समाज की संकीर्णताओं से मुक्त होता है | वह पुकार जो हमारी धमनियों में बहती है , जो हमें अपने पूरे अस्तित्व  में सुनाई पड़ती है , हर क्षण, हर वक़्त , हर उस समय जब हमारा हृदय उस सत्य को दृढ़ता से दोहराता है – हर बार जब वो धड़कता है और वो सत्य बहता है हम में , जीवन प्रवाह बनकर  | 

शायद  जो चीज़ इस कविता को एमर्सन की कलम से आने का सम्मान देती है – वो है जब यह इंसानों की , प्रेम में सम्मिलित होकर भी स्वतन्त्र होने की पैरवी करती है |पर उसके साथ ही इसका एक आयाम यह भी है कि एमर्सन ने यह अपनी पत्नी की मृत्यु के शोक से उबरने के लिए लिखी |उनके वियोग में उन्होंने एक ऐसी चीज़ को थामने की कोशिश कर रहे थे जो जीवन की एक बेरंग परछाईं थी , और कुछ नहीं | पर हम बीते हुए वक़्त को जितना अपने नंगे हाथों से रोकने की कोशिश करते हैं , हमारे हाथ उतने ही घावों से भरते जाते हैं |हम जितनी बेबसी से  किसी जा चुके इन्सान की विदा को झुठलाना चाहते हैं – यादों और उसकी निशानियों से , हम जीवन के सोते से उतना ही कटते जाते हैं | उन संकीर्ण और अधमरी चीज़ों से जीवन के स्रोत को बंद कर देते हैं | इस सन्दर्भ में, कविता की कुछ पंक्तियाँ बिलकुल नया अर्थ ले लेती हैं | (मत चाहो रोकना तुम  उसे , उसके दुशाले के किनारे से ,न ही रखो अपने पास वो गुलाब ,जो उसने फेंका हो अपनी वसंत किरीट से )

पुस्तक से साभार , चार्ल्स सिम्स की ‘टाईटेनिया का पुनर्जागरण ‘ (1896)

पर उस प्रेम का क्या जिसे स्वीकार न जाये ? जिसका उत्तर न मिले ? उन स्वप्नों का क्या जिनका वास्तिवकता से सहमेल न हो पाए ? उस जूनून का क्या जिससे सिर्फ़ एक गहरा ज़ख्म मिला हो ? सच्चे सपने और सच्चे प्रेम के आशिक इस प्रश्न का उत्तर अपने एक प्रश्न से देंगे .. उनका क्या ?  एमर्सन इनसे भी आगे जाकर एक काव्यात्मक आश्वस्ति देते हैं | प्रश्न प्रेमी का नहीं , प्रेम का था | प्रश्न विजय का नहीं था , प्रश्न था इस कोशिश में अपने सबकुछ की बाज़ी लगा देने का , खेल के रूख से बेखबर | यह सुनने में कितना भी पुराना लगे , जीवन में गंतव्य से ज्यादा अर्थवान यात्राएं होती हैं | असल खज़ाना सोना नहीं है , असल खज़ाना है कीमिया सीखकर खुद सोना हो जाना |

आखिर ईश्वर कौन है, सिवाय उस मनुष्य के जो प्रेम के लिए  , यह विश्वास करता है कि वह पूरे ब्रह्माण्ड को  अपनी हथेलियों में थाम सकता है ? और दैवीय इच्छा क्या है अगर यह नहीं – कि  ईश्वर मुस्कुराकर देखता है जब वही मनुष्य प्रेम में आकंठ डूबकर , असल में ऐसा करने में सफल भी हो जाता है ?

पढ़ें और आनंद लें –

प्रेम में सब कुछ दे दो ,

अपने हृदय का अनुसरण करो

मित्र, परिवार , अपने दिन 

धन, वैभव , ऐश्वर्य 

योजनाएँ , अपनी प्रेरणा और नाम का उधार 

कुछ भी मत करो इंकार 

 

वो है एक वीर स्वामी 

उस पर करो विश्वास 

पूर्ण समर्पण 

टूटे न आस 

ऊर्ध्व और ऊर्ध्व 

जैसे दोपहर का सूर्य 

अधखुले पंखों के साथ 

आधी ही बताये बात 

पर है वो देवता 

ज्ञात है उसे अपना रास्ता 

और आकाश का विस्तार ..

 

वह कभी नहीं था निर्बलों  के लिए 

हो जाएँ जो क्लांत 

उसे चाहिए वीर, ओजस्वी

शंकाओं से ऊपर , शांत 

वह देगा ईनाम 

लौटेंगे वो 

विस्तृत करके स्वयं का वितान 

उनकी गति ऊर्ध्व और ऊर्ध्व , सदैव

 

प्रेम के लिए सब कुछ दो त्याग 

वचन लो समर्पण का ,

और तुम्हारा ह्रदय होगा योग्य 

एक दृढ प्रयास और 

तुम होगे मुक्त ..

एक यायावर से स्वतंत्र 

आज , कल और हमेशा के लिए 

अपने प्रेम के होकर | 

 

अपने जीवन से बंधो अपनी प्रियतमा से 

पर विस्मय का बखान 

जब उसके हृदय में धीमे से हो 

एक गीत गुंजायमान 

तुमसे पृथक भी आनंद की उपस्थिति है 

इस सम्भावना का  ले वो संज्ञान 

उसे रहने दो स्वच्छंद !

गाने दो मुक्ति का गान !

मत चाहो रोकना तुम उसे 

उसके दुशाले के किनारे से.. 

न ही रखो अपने पास वो गुलाब 

जो उसने फेंका हो अपनी वसंत-किरीट से 

 भले ही तुमने उससे किया हो प्रेम  

ऐसे जैसे करता है कोई अपनी महती छवि से 

और उसके वियोग से मद्धिम हो जाता उजास 

खींच लेता संसार से  जीवन प्रवास ,

अपने हृदय की गहराइयों में जानो ..

जब अर्ध -देवता जाते हैं 

तब देवता पधारते हैं …

पढ़ें इसके साथ खलील जिब्रान की प्रेम के उन्मुक्त आकाश की कविता , जो संयोगवश इस संग्रह का भी हिस्सा है और शोक को बेहतर समझने के लिए रिल्के का यह संवेदनशील पत्र |

 
(एमर्सन की कविता का अंग्रेजी से अनुवाद- शुभांगी मिश्र)

 

( कविता की समझ और अनुवाद में मार्गदर्शन के लिए प्रोफेसर नीता पाण्डेय का बहुत आभार )

 

 

BP