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सरस्वती मेला

चंद्रयान और इंसानी जिजीविषा पर गुलज़ार

पूरे का पूरा आकश घुमा कर बाज़ी देखी मैंने ..
मेरी ख़ुदी को तुमने चाँद चमत्कारों से मारना चाहा
मेरे एक प्यादे ने तेरा चाँद का मोहरा मार लिया –

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चाँद को भी हमने फ़तह कर लिया | चंद्रयान- II की सफलता सिर्फ विज्ञान की सफलता नहीं है , यह हर उस मानवीय प्रयास की सफलता है जिसने समय की शुरुआत से दुनिया को बेहतर जानने और बेहतर बनाने की कोशिश की है | यह चंद्रयान उस कांच की बोतल की तरह है जो कोई सन्देश लेकर समुद्र में क्षितिज तक बहती जाती है | यह चंद्रयान उड़ा है, लाखों-करोड़ों लोगों की मेहनत की निशानी लेकर , चाँद तक |

यह मानवीय जिज्ञासा और जिजीविषा की एक कामयाबी है और एक उत्सव भी | मानवता, इन्सान होने का मतलब कहीं न कहीं वो हार न मानने का जज़्बा भी है जिसने इंसानी ज़िन्दगी को अर्थ दिया है | इसी बात को आगे बढ़ाते हुए हम शब्दों के कीमियागर ( अलकेमिस्ट ) गुलज़ार से मिलते हैं जो इंसानी जज्बे के हक़ में पुरज़ोर आवाज़ उठाते हैं | उनका इन्सान मुश्किलों के रास्ते में घबराता नही , बल्कि अपने इन्सान होने के मानी को साबित करने के लिए हर जंग लड़ सकता है, | पूरी कायनात से, और पूरी कायनात के पार खुदा से भी | बड़े से बड़े ख़लीली करिश्मे के आगे ,हादसात के आगे , इंसानी कोशिश की छोटी सी पहल ही काफ़ी है |

उम्मीद और विरोध की बस एक कोशिश, वो कितनी ही छोटी क्यों न हो | ठीक उसी तरह जिस तरह मज़बूत से मज़बूत दीवार में भी जब  एक नन्हा पौधा जब अपनी जड़ें जमाता है तो उसमें दरारें पड़ जाती हैं |  गुलज़ार जैसे शायर की कलम यह इतिहासनामा लिखते हुए धड़क उठती है, जिसमें उनका इन्सान और हमारी इंसानियत जीत जाती है |

चंद्रयान की सफलता के साथ इंसानी नस्ल की हर फ़तह के लिए है यह नज़्म, उनके संग्रह ‘ यार जुलाहे ‘ से | पढ़ें और आनंद लें …

ख़ुदा

पूरे का पूरा आकश घुमा कर बाज़ी देखी मैंने
काले घर में सूरज रख के ,
तुमने शायद सोचा था , मेरे सब मोहरे पिट जायेंगे
मैंने एक चिराग जला कर
अपना रस्ता खोल लिया

तुमने एक समंदर हाथ में ले कर , मुझपर ठेल दिया
मैंने नूह की कश्ती उसके ऊपर रख दी
काल चला तुमने और मेरी जानिब देखा
मैंने काल को तोड़ के लम्हा-लम्हा जीना सीख लिया
मेरी ख़ुदी को तुमने चाँद चमत्कारों से मारना चाहा
मेरे एक प्यादे ने तेरा चाँद का मोहरा मार लिया –

मौत की शाह देकर तुमने सोचा अब तो मात हुई
मैंने जिस्म का खोल उतार के सौंप दिया
और रूह बचा ली

पूरे-का-पूरा आकाश घुमाकर अब तुम देखो बाज़ी |

BP