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सरस्वती मेला

छोटे ख्याल की बंदिश सा एक गाना

माटी-बानी मिटटी की ही आवाज़ है | वही मिटटी जो हजारों साल पुरानी होते हुए भी, आज भी उर्वर है |

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साजन ये मत जानियो तोहे बिछड़त मोहे को चैन।
दिया जलत है रात में और जिया जलत बिन रैन।।

प्रेम और विरह की यह भाषा अमीर खुसरो के समय से ज़्यादा बदली नहीं है | इनको साथ में पिरोती आई है संगीत की डोर जो मानव इतिहास में कहीं भी टूटी नहीं है | भारतीय शास्त्रीय संगीत में यह माना जाता है कि एक प्रतिष्ठित कलाकार को रियाज़ करते हुए तीन सप्तक को आसानी से साध लेना चाहिए | मंद्र सप्तक के पंचम ( नीचे के सात सुरों के मध्य ) से लेकर मध्य सप्तक से होते हुए तार सप्तक के पंचम तक (ऊपर के सप्तक के मध्य  तक ) | मेरा मानना है कि इसका अर्थ है कि एक कालजयी कलाकार अपने वर्तमान में रहते और रचते हुए , अतीत की  तरफ हाथ बढ़ाकर, प्रेरणा लेता है और भविष्य तक को सौन्दर्य के उजास से भर देता है | मंद- मध्य से तार तक जाता है | क्योंकि जड़ें गहरी होने का क्या अर्थ है जब तक हमारी कोपलें और फूल आकाश को आच्छादित न कर दें ?

माटी बानी गायिका निराली कार्तिक और संगीतज्ञ कार्तिक शाह की एक पहल है जिसमें वे भारतीय फ्यूज़न संगीत बनाते हैं | उन्होंने वैश्विक स्तर पर कई देशों के संगीतज्ञों की सहभागिता से काम किया है जिसमें वो न्यू यॉर्क के ट्रेन स्टेशन से लेकर बर्लिन की सड़कों तक पर गाते और झूमते दिखाई देते हैं |भारतीय संगीत परंपरा से विचार और आकार लेते हुए , उसे समसामयिक और प्रगतिशील बनाते हैं |दुर्लभ वाद्य-यंत्रों के साथ वे अलग भाषाओँ के साथ भी प्रयोग करते हैं | उनके गानों में अपनी कला के प्रति इतना प्रेम और कुछ नया करने की इतनी ख़ुशी होती है कि यह उल्लास आपको भी भीतर तक भिगो जायेगा |

अभी कोविद -19 की महामारी के बीच उन्होंने अन्तराष्ट्रीय कलाकारों के साथ मिलकर एक गाना तैयार किया है | सिन्दूरी नाम का यह गाना एक छोटे ख्याल की बंदिश की तरह अपनी पंखुडियां खोलता है | राग शहाना में बंधा यह गाना विरह की वही पुकार है जो अमीर खुसरो के सीने में सांसें लेती थी ..

सावन की मध्य-युगीन लघु – कलाकृति ( मिनिएचर )

स्पेन की ओडिसी नृत्यांगना पैट्रीशिया सल्गाडो और सरोद वादक जोर्डी प्रैट्स और बर्लिन की  चेलिस्ट मार्टिना बेर्तोनी  ने साथ आकर यह दिखा दिया कि कला ,और कुछ सुंदर बनाने की इंसानी चाह को कोई लॉक डाउन रोक नहीं सकता ..

इस गीत के  बोल भी पारम्पिक छटा लिए हुए हैं ..

सिन्दूरी 

सिन्दूरी ढली साँझ री

रतिया भई बिरहा भरी

तेरे नाम की लगी आस री

सिन्दूरी ढली सांझ री

चुनरी भी धानी अंग  लगाये 

बिछिया भी अंगुली में डस-डस जाये 

 

काली – नीली चूड़ियों से बईयाँ सँवारी 

बाँधूं मैं पनवा में मीठी सुपारी 

फुलवा मंगावो कोई गजरा लगावो 

माथे की चाँदन की बिंदिया सजावो

नाचूँ आज री !

झिर -मिर झिर -मिर बरसे राग यमन 

छूके सुरमयी हो गयी आज पवन 

सिन्दूरी ढली सांझ री ….

सुनें और आनंद लें …..

आप में शायद कुछ लोग पहचान पाएँ , यह वही कलाकार हैं जिनका लॉक -डाउन का ही दूसरा विडियो ‘ कर्पूरगौरं’ बहुत प्रसिद्द हुआ है | इसमें  इन्होने 9 देशों के कलाकारों के साथ मिलकर काम किया है  |

माटी-बानी मिटटी की ही आवाज़ है | वही मिटटी जो हजारों साल पुरानी होते हुए भी, आज भी उर्वर है | उसी मिट्टी को जानने के लिए माटी- बानी के बगीचे में भी घूम आइये, जो बहुत तरह के  सुरीले फूलों और पौधों से लहकता है | 

उनका  प्रेम पर लिखा गया काव्यात्मक गीत , ढाई आखर नाम ; मल्हार के लिए लिखा गया प्रेम पत्र ; बूंदन -बूंदन , प्रियतम को मनाने के लिए  ( हिंदी और फ्रेंच में ) लिखा गया   बलमा और  मोहब्बत से चमकता सूफियाना  रंग -रंगिया – ये सब सुनिए और देखिये कैसे मोहब्बत और कला में दूरियाँ और किसी भी तरह की सीमाएं अर्थहीन होती जाती हैं | 


BP