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सरस्वती मेला

जीवन की हार और हौसले पर नीरज

छिप-छिप अश्रु बहाने वालों!
मोती व्यर्थ बहाने वालों!
कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है।

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मुझे कभी – कभी महसूस होता है कि मेरी मम्मा ने मुझे सिर्फ़ कहनियों और कविताओं पर बड़ा किया | ख़ुशी में कहानियों का इनाम और मुश्किल वक्तों  में कविताओं में नसीहत – मेरे बचपन में साहित्य मेरा उतना ही अच्छा दोस्त था जितनी मम्मा खुद थीं | 

जब – जब जीवन में मैं हतोत्साहित होने के करीब आती थी  , मम्मा मुझे यही कविता सुनाती थीं |और इस   कविता ने हमेशा मुझे थाम लिया है | कभी – कभी अपने पूरे जीवन से कीमत अदा करने पर भी  हम अपने सपनों की पूरी कीमत नहीं चुका पाते | तब यह समझना बहुत आवश्यक होता है कि स्वप्न कितना भी विशाल क्यों न हो जाए , जीवन के वितान से छोटा ही होता है | हम सब अपने बचपन में एक आशावाद लेकर बड़े होते हैं जो मासूम होने के साथ -साथ थोड़ी खोखली भी होती है | हमें लगता है कि दुनिया सुंदर है और जीवन बहुत प्यारा क्योंकि हमने इन दोनों की नकारात्मक उदासियों से बहुत दूर अपनी नादानी में सुरक्षित रहते हैं | जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं और दुनिया को उसके  तमाम अंधेरों के साथ देखते हैं ,हम अपनी इस नादान समझ को  एक परिपक्व आशवाद से बदल सकते हैं | वो सकारात्मकता जो तमाम विसंगतियों से भरे इस जीवन में भी, इसके  सौन्दर्य और संभावनाओं  में विश्वास  करती है |  शायद यही समझ और स्वीकार्यता हमें सपने के चकनाचूर हो जाने पर भी , जीवन के लिए, एक बार फिर प्रयास करने के लिए प्रेरित करती है | वह सकारात्मकता जो खुशनुमा होते हुए भी ठोस होती , हलकी नहीं , हमारी जीवन जीकर और दुनिया देखकर अर्जित की हुई होती है | जिसके होते हुए अगर असंख्य स्वप्न मर भी जाएँ, तब भी जीवन अपनी पूरी आभा में जीवित रहता है |

पढ़ें गोपालदास नीरज की यह कविता जो यथार्थ की धरती पर खड़ी होकर भी आशा और उम्मीद की रौशनी बुनती है –

छिप-छिप अश्रु बहाने वालों!
मोती व्यर्थ बहाने वालों!
कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है।
सपना क्या है, नयन सेज पर,
सोया हुआ आँख का पानी,
और टूटना है उसका ज्यों,
जागे कच्ची नींद जवानी,
गीली उमर बनाने वालों!
डूबे बिना नहाने वालों!
कुछ पानी के बह जाने से, सावन नहीं मरा करता है।
माला बिखर गयी तो क्या है?
खुद ही हल हो गयी समस्या,
आँसू गर नीलाम हुए तो,
समझो पूरी हुई तपस्या,
रूठे दिवस मनाने वालों!
फटी कमीज़ सिलाने वालों!
कुछ दीपों के बुझ जाने से, आँगन नहीं मरा करता है।
खोता कुछ भी नहीं यहाँ पर,
केवल जिल्द बदलती पोथी,
जैसे रात उतार चांदनी,
पहने सुबह धूप की धोती,
वस्त्र बदलकर आने वालों!
चाल बदलकर जाने वालों!
चन्द खिलौनों के खोने से बचपन नहीं मरा करता है।
लाखों बार गगरियाँ फूटीं,
शिकन न आई पनघट पर,
लाखों बार किश्तियाँ डूबीं,
चहल-पहल वो ही है तट पर,
तम की उमर बढ़ाने वालों!
लौ की आयु घटाने वालों!
लाख करे पतझर कोशिश पर उपवन नहीं मरा करता है।
लूट लिया माली ने उपवन,
लुटी न लेकिन गन्ध फूल की,
तूफ़ानों तक ने छेड़ा पर,
खिड़की बन्द न हुई धूल की,
नफरत गले लगाने वालों!
सब पर धूल उड़ाने वालों!
कुछ मुखड़ों की नाराज़ी से दर्पन नहीं मरा करता है।

प्रेरणा पाने के उपाय 1.एक चुनौती ढूँढें 2. उसपर काम करें 3. परिणाम में अपनी ख़ुशी तलाशें 4. नई चुनौती की खोज में आगे बढ़ जाएँ .. राम्या श्रीराम की ‘द टैप ‘ से साभार

BP