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सरस्वती मेला

पहले वैज्ञानिक- साइंस और स्त्रीत्व का जश्न मानती एक कविता

मैं नहीं मानती कि जीवन को अलग-अलग वर्गों में बाँट कर देखा जा सकता है | जिसमें हर खाने का एक दुसरे से अलग अस्तित्व हो, जो अपने आप में पूरा  हो , बंद हो  , न ही कुछ देने में समर्थ और न ही स्वीकार करने में | पर दुःख की बात है कि हम अक्सर जीवन को ऐसे वर्गीकृत करके ही देखते हैं | हम भूल जाते हैं की हर विषय और हर मानवीय उद्गम का स्रोत एक ही होता है – जिज्ञासा , संसार को जानने की इच्छा , दुनिया में उपस्थित सौन्दर्य के प्रति एक गहन विस्मय और कृतज्ञता का भाव | इस तरह कविता और विज्ञान एक एक दूसरे से दूर होने की जगह , ज्यादा करीब हैं | दोनों ही अन्वेषण से शुरू होते हैं , और जिज्ञासा के रास्ते से चलकर हमको विस्मय तक ले जाते हैं |


इस तरह दो विषयों को आपस में प्रेरणा और विचारों के एक संवाद में देखने से ज्यादा ख़ुशी मुझे कहीं नहीं मिलती | जब दो अलग विषय साथ मिलकर सुंदर कुछ रचते हैं या एक दुसरे के माध्यम से समृद्ध होते हैं तो मुझे दुनिया कुछ ज्यादा अर्थवान नज़र आती है | ‘द मशरुम हन्टर्स ‘ में नील गैमन ने ऐसा ही कुछ किया है जब वो एक साइंस के बारे में लिखी गयी कविता से मानवजाति के इतिहास के एक ऐसे हिस्से से पर्दा उठाते हैं जिसपर रुक कर हमने आज तक विचार नहीं किया है |
मानव जाति इस क्रूर दुनिया में इसीलिए जीवित रह पाई क्योंकि हमने बहुत पहले सीख लिए था कि सर्वशक्तिमान प्रकृति से जीतने का हमारे पास सिर्फ एक तरीका है – जो चीज़ इन्सान को इंसान बनती है – हमारी बुद्धि | तब हमने अपनी आस-पास की दुनिया को देखना, जानना और समझना शुरू किया | चीज़ों को होते देखा और वो क्यों होती हैं इसपर विचार किया , उनकी वजहें सीखीं | इन  रोज़मर्रा की मामूली चीजों ने  ( जिनपर तब जीवन और मृत्यु का एक महीन धागा टिका रहता था) ही बाद में विज्ञान और शोध का रूप लिया  |
यह कविता उसी विज्ञान की भावना को समर्पित है| साथ ही ये उन पुरा-वज्ञानिकों को भी समर्पित है जिन्होंने शायद पहली साइंस की थ्योरी बनाई होंगी | प्राग-ऐतिहासिक समय हो या फिर आज का दिन , जब हम साइंस की बात करते हैं तो निश्चित तौर से हमारे सामने विज्ञान की खोज में पसीना बहते  पुरुषों की ही तस्वीर आती है | पर इसका ये मतलब नहीं है कि साइंस पर विज्ञान पर, तर्क पर, अन्वेषण पर और जिज्ञासा पर स्त्रियों हक़ कम है | इतिहास में उनको जगह ज़रूर कम मिली है पर अपनी सबसे सरल और सशक्त रूप में साइंस में उनका योगदान शायद सबसे ज्यादा है | यह कविता विज्ञान को धूल भरी अलमारियों और शेल्फों से निकालकर ,उसके उचित स्थान,  हम सबके दैनिक जीवन में ले आती है | 
पढ़ें नील गैमन की यह कविता , जो विज्ञान और स्त्रीत्व दोनों को समर्पित है …

साईंस, मेरे बच्चे जैसा कि तुम जानते हो

ब्रम्हाण्ड के व्यवहार को पढ़ना और समझना है

वो टिकी है देखने, मापने और परखने पर

और इन सबको समझकर उन पर नियम बनाने पर।

कहते हैं, पुराने ज़माने में, आदमियों के पास थे दिमाग

जो जानवरों का पीछा करके पकड़ने के लिए बने थे

आँखे मूंदकर, सीधे अनजान के फैलाव में जाने के लिए

और फिर वापस अपने घर का रास्ता पहचानने के लिए

अपने साथ एक शिकार किया हुआ हिरन लाने के लिए

और बदकिस्मत दिनों पर खाली हाथ लौट जाने के लिए

औरतें, जिनको शिकार करने की ज़रूरत नहीं थी

उनके दिमाग रास्ते पर बिखरे चिन्हों से पहचानी डगर बना लेते थे

काँटों की झाड़ी से बाएं और पार कंकड़ों के ढेर के

और देखो आधे गिरे पेड़ के तनें में झांककर

क्योंकि, कभी-कभी वहां मशरूम होते हैं

पत्थर से आग जलाने और कसाईयों के औज़ारों से पहले

सबसे पहला औज़ार था एक बच्चे को रखने का

कपड़े का वो झोला जिससे हाथ खाली रहते थे

और कभी-कभी उसमें मशरूम और फल भी रख लिए जाते थे

साथ ही जड़ें और हरी पत्तियाँ

बीज और लताएं

उसके बाद बना पत्थर का मूसल

फोड़ने, कूटने और पीसने के लिए

कभी-कभी आदमी

चले जाते थे जानवरों के पीछे

सबसे गहरे जंगलों में

कभी न लौटने के लिए

कुछ मशरूम आपकी जान ले लेंगे

और कुछ आपको खुली आँखों से करिश्में दिखाएँगे

और कुछ हमारे पेट की भूख शान्त करेंगे

पहचानो

और कुछ मार देंगे कच्चा खाने पर

और ले लेंगे जान दोबारा

एक बार पकाने पर

पर अगर हम उन्हें झरने के पानी में लें उबाल

और फिर फेंक दें वो पानी

दोबारा दोहराकर उन्हें उबालकर फिर फेंक दें वो पानी

तब हम खा सकेंगे उन्हें अच्छे से दो-चार

 

देखो

प्रसव देखो, देखो पेटों का उभार

और छातियों का आकार

अपने इस तज़ुर्बे से सीखो बच्चों का सुरक्षित दुनिया में लाना

मशरूम खोजने वालियां अपने रस्ते पर चलती हैं

और दुनिया देखती हैं

जो देखती हैं वो समझती हैं

उनमें से कुछ तृप्त अपने होठों पर जीभ फेरते हुए

लम्बा जीवन पाती हैं

जब बाकी अपने पेट पकड़कर

तड़प कर मर जाती हैं

तब नियम बनते हैं

क्या है सुरक्षित और क्या नहीं

ये पीढ़ी दर पीढ़ी हाथों से दिए जाते हैं

नियम बनाओ

जिन औजारों से हम बनाते हैं अपना जीवन

अपने कपड़े अपना खाना और रस्ते घर के

ये सब हम देखकर समझकर

अन्वेषण पर बनाते हैं

प्रयोग पर, माप पर और सत्य पर

और साईंस तुम्हे याद होगा

ब्रम्हाण्ड के व्यवहार को पढ़ना और समझना है

वो टिकी है देखने, मापने और परखने पर

और इन सबको समझकर उन पर नियम बनाने पर

संतति चलती जाती है

एक पुरा वैज्ञानिक

गुफा की दीवारों पर जानवर बनाती है

मशरूम और फलों पर पल रहे

अपने हृष्ट पुष्ट बच्चों को बताती है

कि शिकार के लिए क्या है सुरक्षित

और क्या नहीं

आदमी शिकार के पीछे दौड़ते रहते हैं

सारी वैज्ञानिक थोड़ा धीमें चलती हैं

पहाड़ी की कगर पर

नीचे नहर के किनारे और लाल मिट्टी के पार

उनके बच्चे हैं उन झूलों में

जो उन्होंने बनाये

ताकि वे अपने हाथों से

मशरूम तोड़ पाएं

यामिनी रॉय की कलाकृति
BP