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सरस्वती मेला

प्रेम का उन्मुक्त आकाश – खलील जिब्रान की एक आदर्श विवाह की परिभाषा

पर अपने इस सामीप्य में अन्तराल को भी स्थान दो 
उनमें स्वर्ग की पवन को नृत्य करने दो ..

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प्रेम में डूबकर भी स्वतंत्र रह पाना , प्रेम का सबसे बड़ा आदर्श और उसकी सकी सबसे बड़ी विजय है | और किसी से प्रेम करते हुए , उसकी  स्वतंत्रता की रक्षा कर पाना प्रेम की सबसे बड़ी उपलब्धि |जब प्रेम  उद्दीप्त हो उठे -मेरी समझ में यही उसका  एकमात्र सच्चा स्वरुप है |

प्रेम वास्तिविकता के साथ संभावनाओं की भी बात करता है – हम क्या हैं और क्या बन सकते हैं | इसीलिए प्रेम का आदर्श  बस वो आसमान है जिसको प्रेम का वास्तविक अपनी ज़मीन पर निरूपित करना चाहता है | और थोड़ी कोशिश करके , खुद को ऊपर उठाकर उसे एहसास होता है कि यह असंभव नहीं | 

खलील जिब्रान लेबनन के महान लेखक हुए हैं | उन्होंने एक दार्शनिक की तरह कवितायें , गद्य , कहानियां और उपन्यास लिखे हैं | उनकी सबसे प्रसिद्ध कृति है ‘पैगम्बर ‘ | इस किताब में एक गाँव के पैगम्बर अलमुस्तफ़ा गाँव छोड़कर जा रहे हैं | उनको विदा करने आए गाँव के सारे लोग उनसे जीवन के विभिन्न अध्यायों से प्रश्न पूछते हैं | अपने प्रिय पैगम्बर और आम लोगों का यह संवाद ही किताब की शक्ल लेता है | यहाँ खलील जिब्रान ने इंसानी रिश्तों और अंतरंगता पर जो विचार लिखे हैं उनके सौन्दर्य का कोई जोड़ नहीं है |

लेबानीज़ – अमेरिकन लेखक एवं विचारक ,खलील जिब्रान

इससे ख्याल आता है  मनोविज्ञान के उस अंतर्द्वंद्व का जिसे ‘ साही के सिद्धांत’ ( पौर्क्युपिने थ्योरी ) के नाम से जाना जाता है |यह कहता है कि प्रकृति में शीतकाल में ठण्ड से बचने के लिए साहियों के झुण्ड आपस में एक-दूसरे के करीब आ जाते हैं | एक दूसरे की शरीर की गर्मी से वे उष्णता पाते हैं और एक दूसरे के और करीब आते जाते हैं | इतने पास आने पर उनके कांटे एक-दूसरे को गड़ने लगते हैं और जो स्थिति उनके लिए पहले आरामदायक थी अब वही कष्टप्रद होने लगती है | इस पीड़ा से बचने के लिए वे दूर हो जाते हैं पर समस्या अब फिर वही हो जाती है | साथ की गर्माइश न मिलने पर वे फ़िर ठिठुरने लगते हैं और फ़िर करीब आ जाते हैं | और यह सिलसिला चलता जाता है |

यह इंसानी रिश्तों और उनकी नजदीकियों को समझने के लिए एक बहुत सटीक उदहारण है | बहुत पास आने पर , हम सामने वाले की शख्सियत की दरारों और नोकों से ख़ुद चोट खाते हैं और उसको भी चोट पहुंचाते हैं | रिश्तों का प्रेम, सामीप्य का सौन्दर्य तब ही है जब उनमें थोड़ी दूरियां हों |सांस लेने भर की जगह हो, रिश्ते के लिए भी, हमारे लिए भी | 

इसी भाव को रेखांकित करती हुई , पढ़ें खलील जिब्रान की यह रचना जो पैगम्बर का अंश है –

तुमने साथ जन्म लिया है और तुम्हारा साथ अनंतकाल तक का है 
तुम तब भी साथ रहोगे जब मृत्यु के श्वेत पंख तुम्हारे दिवसों को ब्रह्माण्ड में बिखेर देंगे 
हाँ , तुम ईश्वर की स्मृति की विश्रांति में भी साथ रहोगे 
पर अपने इस सामीप्य में अन्तराल को भी स्थान दो 
उनमें स्वर्ग की पवन को नृत्य करने दो ..

एक दूसरे से प्रेम करो , पर प्रेम का कोई अनुबंध मत करो :
अपितु उसे अपनी आत्माओं के तटों के बीच हिलोरें खाता एक समुद्र बनने दो 
एक दूसरे के प्याले भरो , पर एक ही प्याले से अपनी प्यास मत बुझाओ .
एक दूसरे को अपनी रोटी का टुकड़ा दो , पर एक ही रोटी से अपनी भूख मत शांत करो 
साथ में गीत गो और नृत्य करो और आनंद मनाओ , पर एक-दूसरे को अकेला भी रहने दो 
जैसे वीणा के तार भी अकेले होते हैं जब उनमें एक ही संगीत झंकृत होता है 

अपने हृदय दो , पर एक – दूसरे को नहीं 
क्योंकि सिर्फ़ जीवन के हाथ तुम्हारे हृदयों को थाम सकते हैं 
और साथ खड़े होना , पर बहुत करीब नहीं 
क्योंकि देवालय के स्तम्भ भी दूर-दूर  खड़े रहते हैं 
और बलूत और सरू के वृक्ष एक दूसरे की छाया में नहीं उगते ….

जीवन को अर्थ को बेहतर समझने के लिए ‘ द प्रोफेट ‘ ( मसीहा /देवदूत) ज़रूर पढ़ें |

राम्या श्रीराम के ‘द टैप’ से साभार 


( खलील जिब्रान की कविता का अंग्रेजी से अनुवाद - शुभांगी मिश्र )
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