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सरस्वती मेला

लोकतंत्र के हिज्र में लिखी गयी फ़राज़ की ग़ज़ल

जैसे तुझे आते हैं न आने के बहाने

ऐसे ही किसी रोज़ न जाने के लिए आ

...

ग़ज़ल शब्द का मतलब होता है – ‘ आशिक और माशूक की बातचीत ‘, मोहब्बत के नाम एक पैगाम | पर मोहब्बत शब्द का अपने में कोई मानी नहीं होता , वो तो करने वाले पर होता है कि वो इस लफ्ज़ को कितनी आबरू बख्श सकता है , इसके मानी के आकाश को  हाथ बढ़ाकर और कितना ऊँचा कर सकता है | बेशक इसका विपरीत भी सच है , इसलिए मोहब्बत लफ्ज़ से जुड़ी जितनी कमज़र्फ़ बातें हम सुनते हैं , वह मोहब्बत करने वालों की  होती  हैं ख़ुद मोहब्बत की नहीं  , तमाम कमज़ोर आशिकों और माशूकों के जो इस लफ्ज़ के  मानी को बहुत छोटा कर देते हैं | 

अहमद फ़राज़ एक बेहद मशहूर शायर रहे हैं जिन्होंने अपनी क़लम से इस कदर तक इश्क किया कि उसे हमेशा सच कहने के लिए इस्तेमाल किया | पाकिस्तान के क्रन्तिकारी शायर , आम जनता के दुःख, दर्द और मजबूरियां इनकी कलम और कागज़ पर धड़कते थे | अगर आप फ़राज़ नाम से न भी वाकिफ़ हों तब भी यह बहुत मुमकिन है कि आप इनकी सबसे मशहूर ग़ज़ल से ज़रूर वाकिफ़ होंगे | ‘रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ , आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ ‘ दशकों से अधूरी मोहब्बत के दर्द बयाँ करती आई है | पर क्योंकि फराज़ ग़ज़ल के सच्चे आशिक थे , उनकी ग़ज़ल का क़द इतना बड़ा था कि ज़मीन से निकलकर वो आसमां को छू लेती थी | यह अब भी मोहब्बत का पैगाम  ही  थी पर आशिक और माशूक़ कुछ अलग थे |

अहमद फ़राज़

‘आज के प्रसिद्द शायर’ श्रृंखला की  किताब के प्राक्कथन में संपादक कन्हैयालाल नंदन , जो कि ख़ुद एक प्रसिद्द कवि- संपादक हैं इस ग़ज़ल की बात करते हैं | वे कहते हैं –

वतन से दूरी में अपनों की मोहब्बत  और उनसे  बिछड़ जाने का ग़म अहमद फ़राज़ का पसंदीदा विषय है |

उनकी मशहूर ग़ज़ल , रंजिश ही सही ,  उसी ग़म को आवाज़ देने वाली ग़ज़ल है जिसे कुछ लोग इश्क के रूमानी पहलू से जोड़ कर देखते हैं और आगे बढ़ जाते हैं | लेकिन बकौल फ़राज़ यह ग़ज़ल पाकिस्तान से बार-बार रूठ कर चली जाने वाली जम्हूरियत ( डेमोक्रेसी ) को  मुख़ातिब मानकर कही गयी है |

अपने देश के हालात देखकर वो तड़प थी जिन्होंने उनसे यह शाहकार ग़ज़ल लिखवाई | उनकी लेखनी , तमाम ग़ज़लों और नज़्मों से फ़राज़ एक ऐसी तरक्कीपसंद शायरी की नुमाइंदिगी करते हैं जो आशिक़ -माशूक, हुस्न-इश्क़, हिज्र -वस्ल की बात करते हुए भी इनसे बहुत बड़े मसलों की बात करती है | अवाम की हालात से कला अलग नहीं , यह उनका यकीन भी था और हमारे लिए उनकी  सीख भी |

पढ़ें इस रूमानी ग़ज़ल को दोबारा , एक नए नज़रिये से और महसूस कीजिये उस तड़प को जो नाइंसाफी के खिलाफ़ हम सबके दिलों में सुलगती है …

रंजिश ही सही , दिल ही दुखाने के लिए आ 

आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ 

कुछ तो मेरे पिन्दारे-मुहब्बत का भरम रख 

तू भी तो कभी मुझको मनाने के लिए आ 

पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो

रस्मो-रहे-दुनिया ही निभाने के लिए आ 

किस- किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम 

तू  मुझसे  खफ़ा  है  तो  ज़माने  के  लिए आ 

एक उम्र से हूँ लज़्ज़ते -गिरिया से भी महरूम 

ए  रहते -जाँ  मुझको  रुलाने  के  लिए  आ 

अब तक दिले-खुशफ़हम को तुझसे हैं उम्मीदें 

ये   आखिरी शमएं   भी  बुझाने  के   लिए आ 

माना की मुहब्बत का छुपाना है मुहब्बत 

चुपके से किसी रोज़ जताने के लिए आ 

जैसे  तुझे  आते  हैं  न  आने  के बहाने 

ऐसे ही किसी रोज़ न जाने के लिए आ  

इस ग़ज़ल की सबसे मशहूर अदायगी ग़ज़ल सम्राट मेहंदी हसन साहब की आवाज़ में है 

पर आज अपने इसे नई नज़रों से पढ़ा है तो एक नई आवाज़ में सुन भी लीजिये | पेश है अली सेठी की  दिलकश अदायगी …

BP