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सरस्वती मेला

शोक पर रिल्के – एक युवा कवि को लिखा गया ख़त

हम कैसे भूल सकते हैं मानव मिथहास की चौखट पर खड़ी उन तमाम कहानियों   को जिनमें  ड्रैगन आखिरी पल में खूबसूरत राजकुमारियों में बदल जाते हैं ? शायद हमारी जिंदगी के सारे ड्रैगन असल में राजकुमारियाँ ही हैं जो सिर्फ़ एक बार हमें बहादुर और खूबसूरत होते देखना चाहती हों | शायद वो सब कुछ जो भयावह है , सिर्फ असहायता है जो हमारी मदद चाहती है |

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शोक हमारे जीवन की उन गहनतम भावनाओं में से एक है जिनका हम सामना कर सकते हैं | पर तब भी उसके सामने हम खुद को किंकर्त्तव्यविमूढ़ पाते हैं | उसके वेग और उसकी सघनता के आगे असहाय | वो हमारे पूरे अस्तित्व को निगल लेता है और जिस दृष्टिकोण से हम खुद को और दुनिया को देखते  वह विकृत हो चुका होता है | शोक और उसके साथ होने वाले परिवर्तन में हम खुद को दिग्भ्रमित पाते  हैं |

रेनर मारिया रिल्के एक महान कवि और आत्मा की उदारता के व्यक्ति थे | अपनी कैशोर्यावस्था में उन्हें ज़बरदस्ती एक सैन्य अकादमी में भर्ती करवा दिया गया था | एक बेहद संवेदनशील रिल्के ने अचानक अपने आपको एक ऐसे  वातावरण में पाया जहाँ उनकी कलाकार की आत्मा जैसे  बंध सी गयी थी | कमज़ोर  और भावुक रिल्के को अपने सहपाठियों और शिक्षकों दोनों की यातनाएं सहनी पड़ती थीं |ये सारी मुश्किलात भी रिल्के के अन्दर के कलाकर  को ख़त्म नहीं कर पायीं | शायद , कविता के फूलों की जड़ें बहुत गहरी थीं |तो करीब दो दशकों बाद जब उनको उसी अकादमी से एक ऐसे युवा का ख़त आया जो खुद एक कवि बनना चाहता था और जिसे  ज़बरदस्ती वहां भर्ती  करवाया गया था , रिल्के मदद का हाथ बढाने से खुद को रोक नहीं पाए | 

रेनर मारिया रिल्के

फ्रैंक ज़ेवियर काप्पुस को भी उसकी इच्छा के विरुद्ध उसी सैन्य अकादमी में भर्ती कराया गया था | युवा रिल्के की तरह ही उसका भी वहां दम घुटता था | एक दिन बात-चीत के दौरान ,खुशकिस्मती से फ्रैंक ज़ेवियर के प्रोफेसर ने ज़िक्र किया कि महान कवि रिल्के भी कभी इसी अकादमी में पढ़ते थे | काप्पुस ने रिल्के को ख़त लिखकर अपनी कविता लिखने के प्रयासों पर उनकी सलाह लेने का मन बनाया | इस्लाह से ज्यादा, यह एक हमदर्द इन्सान तक पहुँचने का प्रयास था जो आपको समझ सके | इस तरह शुरुआत हुई एक ऐसे सिलसिले की जो 5 सालों तक चला और जिसमें रिल्के ने 10 ख़त लिखे | इनमें रिल्के की जीवन के प्रति एक गहन समझदारी झलकती है और एक  काव्यात्मक   बोध भी | यह शब्द शायद इसलिए और ज्यादा अर्थवान लगते हैं क्योंकि एक तरह से रिल्के , काप्पुस के माध्यम से अतीत में लौटकर, खुद को ही सांत्वना और हौसले के ये सन्देश दे रहे थे | 

उनमें से एक ख़त रिल्के ने शोक के बारे में लिखा है| ख़त की शुरुआत ही रिल्के यह कहकर करते हैं कि उन्हें कुछ नही पता है | इस बात का महत्त्व हम तब ही समझ सकते हैं जब हमारे दुःख के क्षणों में , हमारे किसी समझदार दोस्त ने बेवजह की नसीहतें देकर हमारे दुःख की अवमानना नहीं की हो ..

मैं आपसे फिर कुछ देर के लिए बात करना चाहता हूँ प्रिय मिस्टर काप्पुस , पर मेरे पास कहने के लिए ऐसा कुछ भी नहीं है जो तुम्हारे लिए उपयोगी हो , शायद एक शब्द भी नहीं | तुम कितनी  ही  गहरी उदासियों से गुज़रे हो | तुमने मुझे बताया कि उनका गुज़रना भी बेहद तकलीफ़देह और मुश्किल था | पर मेरे दोस्त , एक बार रूककर सोचो – क्या यह वृहद् उदासी तुम्हारे भीतर से नहीं गुजरी है ? क्या तुम्हारे अन्दर बहुत कुछ बदल नहीं गया है ? क्या तुम खुद , कहीं पर नहीं बदल गये , इन गहरी उदासी के क्षणों में ?

एक कुशल मनोवैज्ञानिक की तरह रिल्के समझाते हैं कि जीवन में किसी भी चीज़ की अवहेलना  नहीं करनी चाहिए | ख़ासकर उन भावनाओं  और परिस्थितियों की जो मुश्किल और कष्टप्रद हों | 

सिर्फ वही दुःख खराब और खतरनाक होते हैं , जिनको इन्सान दूसरों से बताकर भुलाना चाहता है , दबा देना चाहता है | उन बीमारियों की तरह जिनका सतही रूप से इलाज करके उनको कुछ देर के लिए शांत कर दिया जाता है और फ़िर वे और प्रचंड रूप से वापस आ जाती हैं | वो हमारे अन्दर एकत्र होती जाती हैं और वे जीवन का ही स्वरुप होती हैं | वे जीवन हैं , जिसको जिया न गया हो , जिसका मखौल उड़ाया  गया हो , जिसका उपहास किया गया हो | 

इस भावनात्मक निर्जनता में भटकते हुए हमको ये शब्द हमको हिम्मत देते हैं | उस अंधकार में एक प्रकाश की खुलती राह , जिसको पकड़कर हम चल सकें ..

अगर  यह संभव होता तो शायद   हम अपनी संकुचित समझ के पार अतीत में फैले अपने पूर्वजों के खेतों और मैदानों के परे देखते | तब शायद हम अपने दुखों पर अपनी खुशियों से ज्यादा भरोसा कर पाते | क्योंकि, वो वे पल हैं जब हमारे अन्दर कुछ नया प्रवेश करता है, कुछ अनचीन्हा | 

संकोच में हमारी भावनाएं शांत होकर निश्चेष्ट हो जाती हैं | हमारे अंदर की सारी चीज़ें शांत होकर पीछे सिमट जाती हैं , एक सन्नाटा छा जाता है और वो कुछ नया जो सबसे अनजान है , चुपचाप बीच में खड़ा रहता है | 

मेरा यकीन है कि करीब -करीब  हमारे सारे दुःख के क्षण तनाव के क्षण होते हैं | हमें वो किंकर्तव्यविमूढ़ करने वाले लगते हैं क्योंकि हमें अपने से दूर हो चुकी भावनाओं से जीवन के कोई संकेत नहीं मिलते | हम खुद को उस अनजान चीज़ के साथ अकेला पाते  हैं जिसने हमारी उपस्थिति में प्रवेश किया है | एक क्षण के लिए हमसे वो सब ले लिया गया होता है जो हमारा जाना – पहचाना और आत्मीय  हो  | हम ख़ुद को एक परिवर्तन के मध्य खड़ा पाते हैं जहाँ हम अब स्थिर खड़े नहीं रह सकते |

इगोर मोर्स्की – सर्रियलिज्म

हम बड़े से बड़े परिवर्तन  का मुकाबला कर सकते हैं जबतक हमारे अन्दर का जीवन, हमारा स्वयं न बदले | हम तूफानों में भी अपने जीवन को बाँधने की स्थिरता खोज पाएँ  | पर दुःख अलग तरीके से काम करता है | वह पहले हमें अन्दर से बदलता है और फिर ये बदलाव बाहर परिलक्षित होते हैं ,  और इस तरह इसको समझना अधिक मुश्किल होता जाता है |यह कुछ इसी तरह है जैसे एक चक्कर की बीमारी से पीड़ित व्यक्ति ( वर्टिगो का शिकार ) ख़ुद को भूकम्प की तबाही के बीच खड़ा पाए |

और यही कारण है कि दुःख बीत जाता है : जो हमारे अन्दर नया प्रविष्ट हुआ है , वो चीज़, वो  उपस्थिति हमारे ह्रदय में , हमारे ह्रदय के  गहनतम कक्षों में पहुँच चुकी होती है – और वो वहां भी स्थिर नहीं रहती , वो हमारे रक्तप्रवाह में घुलकर हमारी धमनियों में बहने लगती है | और हम यह नहीं जान पाते कि वो क्या थी | कोई भी आराम से हमें यकीन दिला सकता है कि कुछ भी घटित नहीं हुआ है : पर तब भी हम वैसे ही बदल चुके होते हैं जैसे एक मेहमान के आने पर एक घर बदल जाता है | हम यह नहीं कह सकते कि कौन आया था , शायद हम कभी न कह पाएँ | पर कई संकेत इस बात की पुष्टि करते हैं कि भविष्य ख़ुद में हमें परिवर्तित करने के लिए हमारे अन्दर प्रवेश कर चुका होता है , बाहरी दुनिया में अस्तित्व में आने से बहुत पहले | 

रिल्के पूरे वक़्त हमें दुःख के प्रति खुले होने  की सलाह देते हैं , अपनी भावनाओं को समझने और स्वीकारने की वैसी ही पैरवी करते हैं जैसे आजकल मनोचिकित्सक और ग्रीफ़ काउंसेलर ( शोक मनोवैज्ञानिक ) करते दिखाई देते हैं | यह उस परिवर्तन को उस अधिक सहजता से जीवन में स्थान देने का प्रयास है जिससे हम चाह कर भी भाग नहीं सकते | 

 

इसलिए आवश्यक है कि हम तब अकेले हों और चीज़ों  को देखने-परखने के लिए चौकन्ने हों |यह महत्वहीन सा लगने वाला क्षण, जब भविष्य हमारे अन्दर प्रवेश करता है , वास्तविकता के बहुत ज्यादा निकट  होता है उस क्षण से, जब यही परिवर्तन , थोड़े शोर और आवाज़ के साथ बाहर से घटित होता हुआ प्रतीत होता है | हम जितने ज्यादा धैर्यवान और शांत होंगे , हम अपने दुःख के प्रति उतने ही खुले होंगे और वो कुछ नया  उतनी ही दृढ़ता से हमारे अन्दर प्रवेश कर पायेगा , उतनी ही गहरे तक वो हम में समाएगा , हमारा उसको प्राप्त करना उतना ही निश्चित होगा और हम  उतनी ही आसानी से उसे अपना निजी प्रारब्ध  बना पाएंगे | जब ‘वह’ बाद में घटित होगा , जब यह दूसरों के सामने प्रकट होगा तब हमें उससे एक  गहरी आत्मीयता महसूस होगी | और यह ज़रूरी है | यह बहुत आवश्यक है, और हमारा इवॉल्यूशन ( विकास ) भी उसी दिशा में होगा | हमारे साथ कुछ भी अनजान  या विचित्र नहीं घटित होगा , बल्कि सिर्फ वही होगा जो बहुत समय से हमारे तादतम्य में रहा है, हमारा अपना रहा है | 

आज के समय में जब हम एक छद्म सकारात्मकता के दौर में रहते हैं , जहाँ यह स्वीकार करना  कि हम दुखी हैं एक सामजिक अपराध के रूप में देखा जाता हो , दुःख, शोक और उसके वेग में आए सारे परिवर्तनों को स्वीकार करने की पैरवी करना और भी ज़रूरी लगता है | 

हम आज विज्ञान में गति और उसके सिद्धांतों को कितने ही नये नज़रिए से देखने लगे हैं | बेशक, यह संभव है कि एक दिन हम यह भी समझने लगें की जिस चीज़ को हम प्रारब्ध या भाग्य कहते हैं वह इंसानों से ही निकलती है , कहीं बाहर से नहीं आती | कितने ही लोग उसको जज़्ब नहीं कर पाते जब वह  उसमें रह रहे होते हैं , उनमें ख़ुद को विकसित नहीं कर पाते , और केवल इसलिए खुद से निकलने वाली उस चीज़ को पहचान नहीं पाते | उनका भाग्य उनके लिए इतना अनजाना था कि विस्मय से भरे भय में उन्हें लगा उसने अभी-अभी उनमें प्रवेश किया है | क्योंकि उन्होंने कभी अपने अन्दर वैसा कुछ पाया ही नहीं था | जैसे मानवजाति इतने समय  से  सूर्य की गति के बारे में गलत थी वैसे ही आज वो भविष्य की निर्मिति के बारे में गलत है | भविष्य अपनी पूरी आभा में उदित और स्थिर है , वो हम हैं जो अनंत ब्रह्माण्ड में घूम रहे होते हैं | 

हमें क्यों कठिनाई नहीं होगी?

बीरेन डे की पेंटिंग

मारिया पपोवा ने कहा है कि समझना और समझा जाना – जीवन के सबसे बड़े उपहार हैं | हमारा इस कथन में विश्वास करना हमारी यह भी स्वीकारोक्ति है कि अकेलापन हमारे जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई है | वह अटल सच जो हमारी वास्तविकता को आकार देता है | हम  जीवन जो भी करते हैं  वह इसी के इर्द-गिर्द बुना हुआ होता है | इसको समझने का प्रयास, या इस दर्द को दबाने की कोशिश , अपने अकेलेपन का जश्न मनाना या इससे समझौता करना – हमारी पूरी ज़िन्दगी इसी ध्रुव से बंधी हुई है | एकांत को कवियों से बेहतर  कोई नहीं समझता , इसीलिए रिल्के यहाँ अपने इलाके में बात करते  हैं |

अकेलेपन  के विषय पर लौटते हुए: यह स्पष्ट होता जाता है कि इसकी हमारे जीवन में उपस्थिति  हमारे फैसले पर आश्रित नहीं है | हम सब वस्तुतः अकेले ही हैं | हम ख़ुद को दिलासा दे सकते हैं या भ्रम में रख सकते हैं कि ऐसा नहीं है – बस | कितना बेहतर होगा कि हम आखिर मान ही लें कि हम नितांत अकेले हैं : हाँ, इस सच को स्वीकार कर लें | हमारे दिमाग इस बात से स्तब्ध रह जायेंगे , काफी हद तक लड़खड़ा जायेंगे क्योंकि वो सारी चीज़ें जिनपर वे  केन्द्रित थे वे उनसे छीन ली जाएँगी | ऐसा कुछ भी नहीं होगा जो हमारा आत्मीय हो और हमारे निकट हो , जो कुछ होगा वो हमसे अनजान और अनंत सी लगती दूरी पर होगा | 

एक इन्सान को कुछ ऐसा ही लगेगा अगर उसको बिना किसी व्यवहारिक तैयारी के एक बहुत ऊँचे पहाड़ की चोटी पर खड़ा कर दिया जाये | यह एकअनिश्चितता का भाव होगा , इतना बड़ा जैसा उसने पहले कभी नहीं महसूस किया होगा – एक अनाम वस्तु का डर , उस अनाम भय के  सामने उसकी असहायता  होगी जो उसे करीब -करीब नष्ट कर देगी | 

उसे लगेगा कि वह गिर रहा है या उसे बाहरी ब्रह्माण्ड में फेंक दिया गया है जहाँ वह हज़ार टुकड़ों में फट जायेगा | उसके दिमाग को कितने बड़े झूठ का निर्माण करना पड़ेगा कि वह अपनी इस वास्तविकता का सामना कर पाए , अपनी इन्द्रियों पर भरोसा कर पाए , अपनी सोच को स्पष्ट कर पाए |जो इन्सान अकेला होता है उसके लिए उसकी दुनिया के माप, दूरियों के माप  कुछ इसी तरह बदल जाते हैं | 

कुछ इस तरह के बदलाव उसका जीवन देखने का दृष्टिकोण ही विकृत कर देते हैं | और , ऊँचे  पहाड़ की चोटी की तरह ही कुछ कल्पनाएँ और शरीर  में कुछ ऐसी हरकतें प्रवेश करती हुई लगती  हैं जो असहनीय हो जाती हैं | पर यह ज़रूरी है कि हम उसका  भी अनुभव करें | हमें अपने अस्तित्व को को उसकी हर गहराई और हर ऊंचाई , उसके  हर सीमांतों तक अनुभव करना चाहिए : सबकुछ, वह जो अकल्पनीय है उसको भी स्वीकार करना आवश्यक है | असल में , जीवन में हमसे बस एक साहस की उम्मीद की जाती है : हर उस अकल्पनीय , विसंगति भरी और समझ से परे चीज़ के सामने साहसी होना जो हमारे सामने आए |

इस ख़त में रिल्के इन्सान के बनने के उस सौन्दर्य की बात करते हैं जो आमतौर पर मुश्किल और  दुरूह समय से निकलकर आता है | वो समय जब हमारा विकास होता है, जब हम परिपक्व हो रहे होते हैं | इंसानी लार्वा की तितली बनने की कहानी  –

लोगों ने इस मामले में कायरता दिखाई है इससे जीवन को अपूर्णीय क्षति हुई है | उन सारी चीज़ें जिनको हम भूत-प्रेत कहते हैं , वो चीज़ें जो  पारलौकिकता और मृत्यु से सम्बंधित हैं , इन सारी चीज़ों को हमने  अपनी ज़िद से रोज़मर्रा के अनुभवों से इतना बाहर धकेल दिया है कि उनके प्रति हमारी ग्राही संवेदनशीलता अपंग हो चुकी है  |और यह सब तब जब हम ईश्वर की बात ही न कर रहे हों |

जो अनजान है उसके भय ने न सिर्फ़ एक इंसान के जीवन को निर्धन बनाया बल्कि दो इंसानों के बीच के रिश्ते को भी सीमित कर दिया | ऐसा महसूस होता है जैसे इस भय ने असंख्य संभावनाओं  की नदी को एक ऐसे शुष्क तट में परिवर्तित कर दिया जहाँ सारी सम्भावनाएँ क्षीण हो जाती हैं | क्योंकि यह सिर्फ़ स्थूलत्व (inertia) ही नहीं है जो  जीवन की असह्य निरुपायता , इंसानी रिश्तों के पुनर्नवा न होने की अकल्पनीय एकरसता को बार – बार दोहराने पर मजबूर करती है | यह किसी भी नये अनुभव , किसी भी अनिश्चितता के प्रति हमारी बेरुखी  है जो अक्षम्य है |

सिर्फ वह जो हर चीज़ की उम्मीद कर सकता है , अकल्पनीय की भी ,सिर्फ उसका ही अपने जीवन से मात्र जीवित होने से ज्यादा एक रिश्ता कायम हो पायेगा – वह अपने अन्दर के जीवन स्पंदन के सोते में पूरी तरह से डूब पायेगा , उसकी हर सम्भावना उसमें खिल पायेगी | अगर हम जीवन की तुलना एक कमरे , छोटे या बड़े, से करें  तो यह दिखाई पड़ता है कि ज़्यादातर लोग केवल एक कोने में ही रहकर संतुष्ट हो जाते हैं | शायद खिड़की के पास या उस जगह पर जहाँ वह चहलकदमी करते हैं | इस तरह वो थोड़ा सुरक्षित महसूस करते हैं |पर खतरों से  लदी हुई हर अनिश्तिता कहीं ज्यादा मानवीय है |यह वही अनिश्चितता है जो एडगर एलेन पो की कहानी में उनके कैदियों को अपने कारावास के कोनो को समझने के लिए  निकलने का साहस देती है और उन्हें वहां अपनी उपस्थिति के अकथनीय आतंक से  आँखें मिलाने की हिम्मत देती है | 

पर हम कैदी नहीं हैं|  हमारे लिए कोई छद्म- छलावे छुपे नहीं पड़े हैं , न ही कोई जाल बिछे हैं | ऐसा कुछ भी नहीं है जो हमें भयभीत करे या यातना दे | हमें जीवन में वहां रखा गया है ( उन परिस्थितियों में ) जो हमारे लिए सबसे उचित है |उसके अलावा हजारों साल के जीवन-चक्र में  , प्रकृति के अनुकूलन में हम जीवन से इतनी साम्यता प्राप्त कर चुके हैं कि अगर हम स्थिर खड़े रहे तो हमें अपने वातावरण से अलग नहीं किया जा सकता | हमारे पास अपनी दुनिया पर अविश्वास का कोई कारण नहीं है , क्योंकि वह हमारे खिलाफ नहीं है | अगर इसमें आतंक हैं , तो वो हमारे अपने आतंक हैं | अगर यहाँ ऊँची खड़ी चट्टानें हैं , खाइयाँ है तो वे हमारी अपनी हैं |अगर यहाँ खतरे हैं तो हमें उनसे प्रेम करना सीखना होगा | और अगर हम अपना जीवन इस विचार से संचालित करें कि हमें खुली बांहों से अनिश्चितता का स्वागत करना चाहिए तो जो चीज़ हमें जीवन में सबसे अजीब लगती होगी वही सबसे विश्वसनीय लगने लगेगी , और सच्ची भी |

‘शाश्वत बुद्ध’ , पारंपरिक तिब्बती थंका

इन शब्दों से बनी उस प्रकाश की पगडण्डी पर हम जब आगे बढ़ते हैं तो पाते हैं कि वह रौशनी कुछ और नहीं हमारे साहस की ही लौ है , जो हमारे साथ जलती है| और हम उसके साथ चलते हैं..

हम कैसे भूल सकते हैं मानव मिथहास की चौखट पर खड़ी उन तमाम कहानियों   को जिनमें  ड्रैगन आखिरी पल में खूबसूरत राजकुमारियों में बदल जाते हैं ? शायद हमारी जिंदगी के सारे ड्रैगन असल में राजकुमारियाँ ही हैं जो सिर्फ़ एक बार हमें बहादुर और खूबसूरत होते देखना चाहती हों | शायद वो सब कुछ जो भयावह है , सिर्फ असहायता है जो हमारी मदद चाहती है |

 जब आपके अन्दर से एक उदासी उठे इतनी विशाल जितनी आपने कभी देखी न हो या फिर आप पर ऐसी बेचैनी तारी हो , जैसे प्रकाश और बादलों की छाया आपके हाथ के ऊपर से गुज़र रही हो – तब आपको डरना नहीं चाहिए मिस्टर काप्पुस| आपको यकीन करना होगा कि आपके साथ कुछ हो रहा है , कि जीवन ने आपको भुला नहीं दिया है , उसने आपको अपनी हथेली में रखा है और वो आपको गिरने नहीं देगा | 

यह हमें बाल शेम तोव की आत्मविश्वास की उस  विलक्षण उक्ति की याद दिलाती है – अगर मुझे गिरना ही है तो गिरने दो | जो मैं बनूँगी वो मुझे थाम लेगी |

आप क्यों अपने जीवन से हर तरह की बेचैनी, शोक , दुःख और उदासी निकाल फेंकना चाहते हैं जब आपको नहीं पता कि वो आपके जीवन में किस उद्देश्य की पूर्ति कर रही  है ?आप अपने आपको उस प्रश्न से क्यों प्रताड़ित करना चाहते हैं कि सब कुछ कहाँ से आया है और सब कुछ कहाँ जा रहा है ? आपको पता है कि आप परिवर्तन की स्थिति में हैं और आप परिवर्तित होना चाहते हैं | अगर आपकी ज़िन्दगी का कोई पहलू  अस्वस्थ है तो उसे ऐसे नजरिये से देखिये कि एक जंतु उस बहाने किसी विदेशी संत्रास से ख़ुद को मुक्त करना चाहता है | इस हालात में आपको उसकी मदद करनी चाहिए कि वो पूरी तरह से बीमार पड़ सके , उसकी बीमारी पूर्ण रूप से फूटे | यही वो रास्ता है जिससे वो ठीक हो पायेगा, उसका विकास होगा  | 

कविता उद्दात और आदर्श  है | पर मुझे यह भी लगता है कि कविता से ज्यादा व्यवहारिक भी कुछ नहीं  | रिल्के आदर्शवाद के सौन्दर्य और व्यवहारिकता की अनिवार्यता दोनों को ही साधकर काप्पुस को यह नसीहतें देते हैं | यह प्रेम और मार्गदर्शन कहीं भी उसको कमज़ोर नहीं करता बल्कि आत्मा को इतना सुदृढ़ करता है कि वो अपने जीवन को अपने हाथों में ले सके |

आपके अन्दर इतना कुछ हो रहा है प्रिय मिस्टर काप्पुस | आपको एक रोगी जितना धैर्यवान और एक स्वस्ठ होते व्यक्ति जितना आशावादी होना होगा- क्योंकि शायद आप दोनों ही हैं | और उससे ज़्यादा भी | आप वो चिकित्सक भी हैं जिसे खुद के ऊपर नज़र रखनी होगी | पर हर बीमारी के दौरान ऐसा वक़्त भी आता है जब एक चिकित्सक सिवाय इंतज़ार के कुछ नहीं कर सकता | अभी, जहाँ तक चिकित्सक होने का सवाल है ,आपको वही करना होगा | 

अपने आपको बहुत करीब से मत परखो | जो कुछ आपके साथ हो रहा है उससे बहुत जल्दी कोई निष्कर्ष मत निकालो | बस उसको होने दो | नहीं तो आप अपने अतीत पर दोषारोपण  करना शुरू कर देंगे ( नैतिक दृष्टि से ) जो कि बेशक हर उस चीज़ का हिस्सा है जिसका आप अभी सामना कर रहे हैं |उन अनियमतिताओं का प्रभाव जो आपके जीवन का हिस्सा रही हैं , आपकी जवानी की गहरी इच्छाएं और ख्वाहिशें जो आपके वर्तमान को प्रभावित कर रही हैं -आपको  उनपर फैसला नहीं देना चाहिए  |

काप्पुस की तरह ही रिल्के का बचपन बहुत मुश्किल और अकेला था | वे काप्पुस को ग्लानि की उन बेड़ियों से मुक्त करना चाहते हैं जो उसने निर्दोष होते हुए भी पहन रखी हैं | यह हमें खलील जिब्रान  की लेखनी की याद दिलाता है | रिल्के यह सिर्फ बचपन के सन्दर्भ में कहते हैं पर मुझे यह समस्त जीवन के लिए ही सत्य लगता है |

खलील जिब्रान की पेंटिंग

बचपन जो बेबसी और अकेलेपन से भरा हो , वो इतना मुश्किल, इतना उलझा हुआ , तमाम तरह के प्रभावों के सामने   के सामने  इतना असहाय और साथ ही साथ जीवन से इतना कटा हुआ दिखता है  कि अगर उसमें कोई दोष, कोई ऐब आ जाये तो उसे दोष कहना सही नहीं होगा | हमें , हर हालत में नाम रखने में बहुत सावधानी बरतनी चाहिए | अक्सर वो किसी  गुनाह का नाम  होता है जो  जीवन ध्वस्त कर देता है , असल गुनाह का वो बेनाम और निजी कृत्य नहीं | वो सिर्फ़ उस व्यक्ति के जीवन की एक ऎसी आवश्यकता रही होगी जिस पर उसने अमल किया होगा | 

जीत और महानता का क्या अर्थ है सिवाय इसके की जीवन को उसके पूरे वैभव के साथ स्वीकार किया जाए ? जीवन हमारे आप – पास अनंत दिशाओं में खुलता है और हमें उसे समझने के लिए हमेशा आगे ही बढ़ते जाना होता है | क्षितिज को पाने की वो  कोशिश जिसमें नज़दीक पहुँचते ही क्षितिज और दूर हो जाता है | यह यात्रा , यह प्रयत्न – समस्त  मानवता का यही कर्तव्य है, यही उसकी खोज और यही उसकी फलश्रुति , उसका इनाम | 

चार्ली मैकेसी की किताब से साभार

( कार्टून के शब्द – तुम सिर्फ़ इस कदम का ख्याल  करो , क्षितिज अपना ध्यान ख़ुद रख लेगा )

आपको यह गहन कोशिश करना इसलिए इतना महत्वपूर्ण लग रहा है क्योंकि आप जीत की इतनी फ़िक्र करते हैं | यह वो ‘महान चीज़ ‘ नहीं है जो आपको लग रही है आपको मिल गयी है , जबकि आपको ऐसा लगने का हक़ है | महान चीज़ है कि वहां कुछ पहले से था, और आप उसे अपनी दुविधाओं और गलतफहमियों की जगह रख पाए- कुछ जो सच्चाई और वास्तविकता के करीब था | बिना उसके आपकी जीत भी बस एक नैतिक प्रतिकर्म रहती और कुछ नहीं | ऐसे अब यह आपके जीवन का एक अध्याय बन चुका है – आपके जीवन का प्रिय मिस्टर काप्पुस – मेरे हृदय में आपके लिए कितनी ही शुभकामनाएं हैं | 

क्या आपको याद है कैसे आपको अपने बचपन में इसी महानता की लालसा थी ? और आज इस महानता की ऊंचाई से आपको और बड़ी महानता की इच्छा है | इसीलिए आपकी ज़िन्दगी आसान  नहीं होगी , पर ठीक इसी वजह से आपका विकास भी नहीं रुकेगा | 

इससे पहले की हम भूलें – नेओमी शिहाम नए ने कहा था कि इससे पहले कि हम दयालुता को ज़िन्दगी की सबसे गहरी चीज़ के रूप में जानें , हमें दुःख को  दूसरी सबसे गहरी चीज़ के रूप में जानना होगा | अब यह सिर्फ पन्ने पर बिखरी स्याही नही रह जाती | हमें पता चलता है कि ये वो अनुभव हैं जो एक इन्सान के  शरीर और आत्मा पर उकेरे गये  हैं |हमें यह भी यकीन होता है कि दुःख से भी इंसान बड़ा होकर निकल सकता है ,अगर वह उसे पर्याप्त उदारता से स्वीकार करे |

अगर मुझे आपसे एक और बात करनी हो तो वो ये होगी – यह मत सोचिये कि  जिस इन्सान के शब्द आपको कभी – कभी  आश्वस्त कर पाते हैं , वो ख़ुद बिना किसी मुश्किलात के इन नसीहतों पर अमल कर पाता है | उसके जीवन में बहुत दुःख और उदासियाँ हैं और वो आपसे बहुत पीछे है | अगर ऐसा न होता. तो उसे आज ये शब्द न मिल पाते |

                                                                                        – आपका 

                                                                                        रायनर मारिया रिल्के

शोक का सबसे बड़ा सत्य उसकी विशालता है | हम जब भी उससे लड़ते हैं ,ख़ुद को लहू-लुहान पाते हैं ; और जिस दिन लड़ना छोड़ देते हैं , उसी दिन से हमारी चोटें भरने लगती हैं | आखिर  , खुद जीवन से लड़ना कैसे संभव है ?

ऐसे ही जीवन की विफलताओं के बीच हिम्मत के लिए पढ़ें   हार और जीवन के हौसले पर नीरज को |

(रिल्के के पत्र का अंग्रेजी से अनुवाद -शुभांगी मिश्र )

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