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सरस्वती मेला

ख़ुद को पहचानने की ज़रूरत – रूमी के शब्दों में

स्वर्ग वहीँ है , उस दरवाज़े के पार ; पर मैंने चाभी खो दी है ..
शायद मैं बस उसे रखकर भूल गया हूँ ...
- ख़लील जिब्रान
मानवता की सबसे पुरानी जुस्तजू स्वर्ग का दरवाज़ा खोलने की ही रही है , पर हमें वो चाभी शायद इसलिए नहीं मिलती क्योंकि वो हमारे कुछ ज़्यादा ही करीब होती है| स्वर्ग शायद कुछ और नहीं बस अपने सत्य के साथ जीना होता है | और खुद की खोज शायद कुछ और नहीं, बस खुद का निर्माण होती है | यह एक बहुत कठिन यात्रा है और साथ ही साथ बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण भी | अनादिकाल से हमारे कवियों ने, विचारकों खुद जलकर ने स्वतंत्रता और मानवीय अस्मिता की यह राह रौशन रखी है |

अफ़ग़ानिस्तान के बल्ख में 30 सितम्बर 1207 को जन्मे जल्लालुद्दीन बल्की भी इसी प्रकाशयात्रा के प्रकाश वाहक रहे हैं | रूमी के नाम से मशहूर , रूमी ने अपने वक़्त के दरवेश सूफीमत में डूबकर उन्होंने बहुत खूबसूरत नज्में लिखीं | उनकी नज्मों में आशिकी की तड़प , इश्क की दीवानगी और एक संत का तजुर्बा दिखाई पड़ता है | सूफीमत के अनुसार रूमी भी कट्टर परम्पराओं से परे जाकर सच को खुद से छोकर देखने के पक्ष में बोलते थे |खलील जिब्रान ने एक बहुत खूबसूरत और व्यवहारिकता की ज़मीन पर आकर कहा था - ' कई ग्रन्थ खिडकियों क शीशे की तरह होते हैं| हम उनसे सत्य देख तो सकते हैं पर वे हमें सत्य से अलग करते हैं |' रूमी ने हमेशा इस तरह के हर शीशे को तोड़कर सत्य के नज़दीक जाने की नुमाइंदिगी की |

रूमी पुराने मिथ-हास की और लौटते हैं और उन तमाम चमकदार कहानियों को प्रतीकों के रूप में इस्तेमाल करते हैं | हमको भी प्रेरित करते हैं की कहानियों का सीना चीरकर उनके धड़कते दिल को अपनी मुट्ठियों में भर लें , उन चमकदार कहानियों से उनका अर्थ ले लें | अपनी क़िस्मत की इबारत को थोड़ा पढ़ते हुए , थोड़ा लिखते हुए ,इस अथाह समुद्र में गोते लगाते हुए हम अचरज से खुद को भी इन कहानियों के अर्थ से चमकते देखें |





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