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सरस्वती मेला

ख़ुद से प्रश्न करने की अनिवार्यता – शिम्बोज़्का

हमारे सौर-मंडल के इस तृतीय गृह पर 

पशुता की निशानियों में 

एक साफ़ अंतरात्मा प्रथम है .. 

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प्रश्न है कि हमें मनुष्य क्या बनाता है | हमेशा से यही प्रश्न रहा है और हमेशा यही रहेगा | पर यह प्रश्न जितना विराट लगता है , इसके उत्तर उतने ही छोटे और ग़ैर- ज़रूरी से लगते हुए हमें मिल सकते हैं | जो चीजें  हमें मनुष्य बनाती हैं वो हमेशा उतनी शानदार और भव्य नहीं होती जितना हम चाहते हैं | जैसे – जैसे हम जीवन जीना सीखते जाते हैं , हमें एहसास होता है कि किसी भी उत्तर से ज़्यादा प्रश्न  करने की यह प्रक्रिया महत्वपूर्ण  है | 

 मैंने हमेशा माना है कि इंसानी सभ्यता तब शुरू हुई जब मनुष्य ने अपने हाथ में पत्थर की जगह तर्क लिए | पर साथ ही साथ मैं मनुष्य- विज्ञान की विदुषी मार्गरेट मीड के भी कथन से पूरी तरह से इत्तेफ़ाक रखती हूँ जब उन्होंने कहा था कि असल इंसानी सभ्यता का आरम्भ तब हुआ जब इन्सान ने स्वार्थ से ऊपर उठकर दूसरों के बारे में सोचना शुरू किया |

ख़ुद के विचारों , कर्म और प्रतिकर्मों पर प्रश्न करना उस प्रक्रिया का अहम् हिस्सा है जिसने हमें क्रूरता की गहराई से बचाने में मदद की है |वो असंख्य प्रश्न जो हमें मनुष्यता की कसौटी पर खुद को परखने के लिए मजबूर करते हैं , उन तमाम रेत के कणों जैसे हैं जो घिसकर हमें बेहतर बनाते हैं  | इन प्रश्नों के सामने खुद को बौना महसूस करते हुए हम, अपनी पूरी मनुष्यता में प्रज्ज्वल रहते हैं |

आज के इस कठिन समय में , जब हम सब अप्पने घरों में बंद हैं और हमारे छोटे कार्य भी एक बड़ा महत्व रख रहे हैं , ये बहुत ज्यादा ज़रूरी है कि प्रश्न करने की इस अनिवार्यता को समझें, बेहतर तरीके से आत्मसात करें और उसका थोड़ा ज्यादा सम्मान करें |

पढ़ें पोलिश नोबेल विजेता और मेरी पसंदीदा कवयित्रियों  में से एक , विस्लावा शिम्बोज़्का की  यह कविता   –

ग्लानि के पक्ष में एक आवाज़

चील कभी नहीं कहती कि दोष उसका है 

और ख़ुद पर संदेह के लिए तेंदुए के मन में कोई जगह नहीं 

पिरान्हा मछली बिना किसी शर्म के वार करती है 

और अगर सांप के हाथ होते तो उन्हें वो सबसे साफ़ ही लगते 

एक सियार को पश्चाताप से क्या ?

और शेर और जुएँ अपने शिकार को छोड़ते नहीं 

और छोडें भी क्यों ? जब उन्हें पता है कि  वो सही हैं 

किसी भी शक की गुंजाईश से परे ..

किलर व्हेल के हृदय होते हैं काफी वज़नी

पर उनपर कभी किसी ग्लानि का बोझ नही होता 

हमारे सौर-मंडल के इस तृतीय ग्रह पर 

पशुता की निशानियों में 

एक साफ़ अंतरात्मा प्रथम है .. 

मंजीत बावा की पेंटिंग

(शिम्बोज़्का की कविता का अंग्रेजी से अनुवाद- शुभांगी मिश्र )

BP