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सरस्वती मेला

ख़्वाब की जुस्तजू और फैज़

दयार-ए-ग़ैर में महरम अगर नहीं कोई
तो ‘फैज़’ ज़िक्र-ए-वतन अपने रूबरू ही सही

‘चाँद लाहौर की गलियों से गुज़र के इक शब…
…’फैज़’ से मिलने गया था , ये सुना है
‘फैज़’ से कहने , कोई नज़्म कहो
वक़्त की नब्ज़ रुकी है !
कुछ कहो , वक़्त की नब्ज़ चले !!’
गुलज़ार ( यार जुलाहे )

बारहा ऐसा होता है की हमारी ज़िन्दगी की नब्ज़ रुक जाती है| हम जिंदा तो होते हैं पर जिंदा होने के मायने भूल जाते हैं | तब ज़रूरत होती है ऐसे चारागार ( डॉक्टर) की जो न सिर्फ़ हमारा मर्ज़ दूर करे , पर वक़्त की नब्ज़ पर भी हाथ रखकर पूछ पाए – ‘ बताओ ? क्या तकलीफ़ है तुम्हे? ये लो दवा, तुम्हारे लिए और तुम्हारी औलादों के लिए ..हमेशा के लिए |’ और सच भी है , कला और साहित्य से निकली दवाइयों की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती |

पढ़ें फैज़ की यह बेतरीन ग़ज़ल जो ख़्वाबों की जुस्तजू की बेचैनियों से लेकर उस ग़म तक की बात करती है जिसे आंसुओं से नही धुला जा सकता | मंजिल के बगैर भी जुस्तुजू की कीमत नहीं घटती, दिखावे के बगैर भी ग़म की टीस ख़त्म नहीं होती | उम्मीद, हौसला , गैरों के बीच खुद से और खुद के सपनों से दोस्ती , अकेलेपन में अपने ख़्वाब और अपनी मंजिल की यादों से आबाद होना – इन सबका एहतराम करती है ये ग़ज़ल |

पढ़ें फैज़ , कि वक़्त की नब्ज़ चले ..

नहीं निगाह में मंजिल तो जुस्तजू ही सही
नहीं विसाल मयस्सर तो आरज़ू ही सही

न तन में खून फ़राहम , न अश्क आँखों में
नमाज़-ए-शौक़ वाजिब है , बेवुज़ु ही सही

किसी तरह तो जमे बज़्म मैकदेवालों
नहीं जो वादा-ओ-सागर तो हा हू ही सही

गर इंतज़ार कठिन, है तो जब तलक-ए-दिल
किसी के वादा –ए-फ़र्दा की गुफ़्तगू ही सही

दयार-ए-ग़ैर में महरम अगर नहीं कोई
तो ‘फैज़’ ज़िक्र-ए-वतन अपने रूबरू ही सही

 
फैज़ को वो चंद चीज़ें जो बेहतर बना सकती हैं , वो है आबिदा परवीन की पुरकशिश गायकी | सुनें कि जब वक़्त के दो सितारे साथ हों तो कैसे वक़्त पर गुल खिल उठते हैं ….

 

BP