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सरस्वती मेला

प्राक्कथन

मेरा मानना है कि इंसानी सभ्यता की शुरुआत उस दिन हुई जिस दिन इन्सान ने अपने हाथ में पत्थर छोड़कर तर्क लिए | हमारी चिन्तनशीलता ही मानवता की सबसे बड़ी थाती है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती आई है | जो शब्द उकेरे गये, कहानियां सुनाई गयीं , गीत गाए गये , कवितायें खिलीं – यही वो सब चिराग जिन्होंने हमारी आज तक की इन्सान के रूप में सफलता की राह रौशन की है | 

इतिहास में हम एक प्राचीन मेले का उल्लेख पाते हैं , जिसमें कला और साहित्य की उपस्थति भी रहती थी और उनका उत्सव भी मनता था  | महर्षि वात्स्यान जैसे महान विचारकों ने अपने ग्रंथों में मनुष्य के जीवन में कला, साहित्य, तर्क और उच्च विचारों के होने के महत्त्व को बार -बार रेखांकित किया है | उनका मानना था कि हर समाज में वैचारिकी और कला की एक सशक्त उपस्थिति होनी चाहिए | हर महीने की पांचवी तिथि को उन्होंने निर्धारित किया था कला और साहित्य के लिए – और ये सभाएं, ये मेले  देवी सरस्वती के मंदिर प्रांगणों में आयोजित होते  थे  |इनको सरस्वती  मेला कहा जाता था | 

मेरे प्रेम का परिणाम , यह वेबसाइट एक आधुनिक मेला है जहाँ कला और साहित्य समाज की उन हर चीज़ों की बात होगी जिन्होंने मुझे छुया है , मेरी ज़िन्दगी में खूबसूरती और रंग भरा है | ये काफी विविध जगहों से आ सकते हैं , भक्तिकाल की कविताओं और एक टेनिस के खिलाड़ी की जीवनी से, संस्कृत के नाटकों से या फिर एक साइंसदान की डायरी से |  निजी तौर पर मेरे  जीवन का हर आयाम मेरे सामने साहित्य से ही खुला है | मेरे लिए किताब के पन्नों के बीच की जगह में वो सारा जादू भरा हुआ है ,जो इन्सान को इन्सान बनाता है |

यह एक सफ़र है उन सारी चीज़ों का संगृहीत करने का , जो बंजर जगहों पर फूल खिला सकती हैं . , बेजान चीज़ों में अंगारे भर सकती हैं | एक सफ़र अचरज और सौन्दर्य को इकठ्ठा करने का  जो अनजाने रास्तों पर बिखरे हो सकते हैं  या फिर मिलते हैं अनछुई  किताबों के पन्नों में | 

सरस्वती मेला का लोगो भी उसी चेतना का प्रतीक है जिसमें इस बात का सम्मान है कि एक समाज ने इंसानी अस्तित्व की जद्दोजहद के बीच में ज्ञान को आराध्य का दर्जा दिया| देवी सरस्वती के पांच  सर हैं , हर तरफ से ज्ञान को प्राप्त करने की सूरत में और सत्य के बहुआयामी होने के अर्थ में भी | यह सरस्वती सुसज्जित हैं , और उन्होंने  पुस्तक और वीणा को धारण किया हुआ है | नीचे लिखा गया है पाश्चात्य दर्शन के जनक कहे जाने वाले रेने डेकार्ट्स के शब्द – कौगिटो एर्गो सम ,  ‘मैं चिंतन कर सकता हूँ इसलिए मैं हूँ ( मेरा अस्तित्व है )|इंसानी वैचारिकी और तर्क को इस उक्ति से बड़ी  श्रद्धांजलि नहीं दी जा सकती | 

लोगो और सरस्वती मेला के हर प्रकाशन में इस्तेमाल होने वाली पृष्ठभूमि को  डिजाईन किया है अजिता आदित्य ने | उनकी भागीदारी और मेरे स्वप्न के प्रति संवेदनशीलता के लिए उनका बहुत धन्यवाद |

आभार मेरे मित्र पीताम्बर कौशिक का भी , जिनके महत्वपूर्ण सुझावों ने हर कदम पर मेरी सहायता की |

 

BP