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सरस्वती मेला

अमृता प्रीतम का अमन का अहदनामा

हम नहीं जानते कि जब कोई अपने हाथ में पत्थर उठाता है
तो पहला ज़ख्म इन्सान को नहीं, इंसानियत को लगता है ....

अपनी आत्मकथा ‘रसीदी टिकट’ में अमृता प्रीतम अपने एक सरहद पार के दोस्त सज्जाद हैदर का ज़िक्र करती हैं | सज्जाद उसमें कहते हैं-‘ अमृता के लिए मेरी मोहब्बत में उसके लिए परस्तिश (पूजा ) भी शामिल है |’ आज अमृता के जन्मदिन पर मैं भी सज्जाद हैदर की ही बात दोहराना चाहूंगी |
अमृता के लिए मेरी मोहब्बत में परस्तिश भी शामिल है | अपनी न जाने कितनी ही रचनाओं से उन्होंने मुझे मोहब्बत का मतलब सिखाया है , अपनी शर्तों पर ज़िन्दगी जीने का हौसला दिया है | जितना सम्मान अमृता ने क़लम का किया है ( चाहे वो उनकी हो या किसी और की ) उतना शायद ही किसी ने किया हो | इसीलिए उन्होंने कई भाषाओँ के बड़े शायर, शायराओं की नज्मों का अनुवाद अपनी भाषा में भी किया |

अमृता प्रीतम का जन्म 31 अगस्त 1919 को गुजरांवाला ( आज के पाकिस्तान ) में हुआ | एक आज़ाद रूह इन्सान , अमृता ने अपनी पूरी ज़िन्दगी एक शायरी की तरह जी | खूबसूरती के बहुत करीब और सच्चाई से रौशन | ये अमृता ही थीं, जिनकी कलम इंसानियत के हक़ की पुरजोर लड़ाई लड़ती रही , चाहे वो लड़ाई वियतनाम में हो , जर्मनी में यह फिर बंटवारे के ज़ख्म को सीते हिंदुस्तान में | इन्सान की आत्मशक्ति की बात करते हुए, अमृता ने अपने इन्सान को बहुत ऊँचा स्थान दिया  | ये वो ही थीं जो कह सकती थीं की सूरज इन्सान के अखलाक़ (आचरण ) से सम्मानित होता है और इन्सान की बदइखलाकी से अपमानित होता है |

उन्होंने कहा था कि वो अपने देश के सूरज को सम्मानित होते देखना चाहेंगी | आज उनके 100 वें जन्मदिन पर, उनका अपने देश के लिए वो सन्देश पढना मौजूं होगा , जो कहीं न कहीं हर जगह और समय से परे जाकर हम सबके लिए लिए सत्य है |

हम नहीं जानते कि जब कोई अपने हाथ में पत्थर उठाता है
तो पहला ज़ख्म इन्सान को नहीं, इंसानियत को लगता है |
धरती पर जो पहला खून बहता है ,
वो किसी इन्सान का नहीं होता , इंसानियत का होता है |
और सड़क पर जो पहली लाश गिरती है ,
वह किसी इन्सान की नहीं होती , इंसानियत की होती है ..
फिरकापरस्ती, फिरकापरस्ती है |
उसके साथ हिन्दू, सिक्ख या मुस्लमान लफ्ज़ जोड़ देने से
कुछ नहीं होगा|
अपने आप में इन सब लफ़्ज़ों की आबरू है |
इनका एक अर्थ है, इनकी एक पाकीज़गी है
लेकिन फिरकापरस्ती के साथ इनका जुड़ना ,
इनका बेआबरू हो जाना है
इनका अर्थहीन हो जाना है ,
और इनकी पाकीज़गी का खो जाना है
जो कुछ गलत है, वो एक लफ्ज़ में गलत है
फिरकापरस्ती लफ्ज़ में |
इस गलत को उठाकर हम कभी ,
इसे हिन्दू लफ्ज़ के कंधों पर रख देते हैं ,
कभी सिक्ख लफ्ज़ के कंधों पर
और कभी मुसलमान लफ्ज़ के कंधों पर
इस तरह कंधे बदलने से कुछ नहीं होगा |
जहाँ जो कुछ गलत है,
उसे समझना होगा
जम्हूरियत का अर्थ, लोकशाही का अर्थ
चिंतनशील लोगों का मिलकर रहना है , मिलकर बसना है
और चिंतनशील लोगों के हाथ में तर्क होते हैं , पत्थर नहीं होते…

आज अमृता दुनियावी रूप में हमारे साथ नहीं है | हमारे साथ अगर कुछ है तो उनकी हमारे हक़ में पढ़ी गयी यह दुआ….

ये खून- जो इन्सान के हाथों से बहते जा रहे
ये ज़ख्म – जो इन्सान के हाथ पर लगते जा रहे
ये वही प्यारे हाथ हैं – जो फूलों को बो सकते हैं ,
ये वही आशिक हाथ हैं – जो किसी के हो सकते हैं
ये हुनरमंद हाथ हैं – जो साजों को छेड़ सकते हैं
ये कामगारों के हाथ हैं – जो सपने जोड़ सकते हैं
ये हाथ पानी ,पवन और अग्नि को बाँध सकते हैं
सूरज का चूल्हा जलाकर , हांडी को रांध सकते हैं
ये हाथ जो धरती की जुल्फें संवार सकते हैं ,
ये वही प्यारे हाथ हैं , जो दुनिया उसार सकते हैं
फूलों और जुल्फों की क़सम – हाथों पे ज़ख्म न लगाओ
ये बहुत खूबसूरत हाथ हैं – इन्हें कातिल न बनाओ
हाथों की हिफाज़त के लिए
आओ हाथ दे दो साथियों |
साथ दे दो साथियों |
कागज़ है यह तक़दीर का ,
क़लम है तदबीर की
इस कलम में –
अमन की स्याही भरो ! दस्तख़त करो !
यह अमन का है अहदनामा –
आओ दुनिया वालों! दस्तख़त करो !

अमृता के सारे हर्फ़ अब काले से सुनहरे हो चुके हैं | वो रौशन हैं अपनी मोहब्बत और सच्चाई की ताक़त से , महके हुए हैं उनके ह्रदय की विशालता से |

आज अमृता के जन्मदिन पर हमारा सूरज सम्मानित खड़ा है ….

BP

ख़्वाब की जुस्तजू और फैज़

दयार-ए-ग़ैर में महरम अगर नहीं कोई
तो ‘फैज़’ ज़िक्र-ए-वतन अपने रूबरू ही सही

‘चाँद लाहौर की गलियों से गुज़र के इक शब…
…’फैज़’ से मिलने गया था , ये सुना है
‘फैज़’ से कहने , कोई नज़्म कहो
वक़्त की नब्ज़ रुकी है !
कुछ कहो , वक़्त की नब्ज़ चले !!’
गुलज़ार ( यार जुलाहे )

बारहा ऐसा होता है की हमारी ज़िन्दगी की नब्ज़ रुक जाती है| हम जिंदा तो होते हैं पर जिंदा होने के मायने भूल जाते हैं | तब ज़रूरत होती है ऐसे चारागार ( डॉक्टर) की जो न सिर्फ़ हमारा मर्ज़ दूर करे , पर वक़्त की नब्ज़ पर भी हाथ रखकर पूछ पाए – ‘ बताओ ? क्या तकलीफ़ है तुम्हे? ये लो दवा, तुम्हारे लिए और तुम्हारी औलादों के लिए ..हमेशा के लिए |’ और सच भी है , कला और साहित्य से निकली दवाइयों की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती |

पढ़ें फैज़ की यह बेतरीन ग़ज़ल जो ख़्वाबों की जुस्तजू की बेचैनियों से लेकर उस ग़म तक की बात करती है जिसे आंसुओं से नही धुला जा सकता | मंजिल के बगैर भी जुस्तुजू की कीमत नहीं घटती, दिखावे के बगैर भी ग़म की टीस ख़त्म नहीं होती | उम्मीद, हौसला , गैरों के बीच खुद से और खुद के सपनों से दोस्ती , अकेलेपन में अपने ख़्वाब और अपनी मंजिल की यादों से आबाद होना – इन सबका एहतराम करती है ये ग़ज़ल |

पढ़ें फैज़ , कि वक़्त की नब्ज़ चले ..

नहीं निगाह में मंजिल तो जुस्तजू ही सही
नहीं विसाल मयस्सर तो आरज़ू ही सही

न तन में खून फ़राहम , न अश्क आँखों में
नमाज़-ए-शौक़ वाजिब है , बेवुज़ु ही सही

किसी तरह तो जमे बज़्म मैकदेवालों
नहीं जो वादा-ओ-सागर तो हा हू ही सही

गर इंतज़ार कठिन, है तो जब तलक-ए-दिल
किसी के वादा –ए-फ़र्दा की गुफ़्तगू ही सही

दयार-ए-ग़ैर में महरम अगर नहीं कोई
तो ‘फैज़’ ज़िक्र-ए-वतन अपने रूबरू ही सही

 
फैज़ को वो चंद चीज़ें जो बेहतर बना सकती हैं , वो है आबिदा परवीन की पुरकशिश गायकी | सुनें कि जब वक़्त के दो सितारे साथ हों तो कैसे वक़्त पर गुल खिल उठते हैं ….

 

BP

चंद्रयान और इंसानी जिजीविषा पर गुलज़ार

पूरे का पूरा आकश घुमा कर बाज़ी देखी मैंने ..
मेरी ख़ुदी को तुमने चाँद चमत्कारों से मारना चाहा
मेरे एक प्यादे ने तेरा चाँद का मोहरा मार लिया –

...

चाँद को भी हमने फ़तह कर लिया | चंद्रयान- II की सफलता सिर्फ विज्ञान की सफलता नहीं है , यह हर उस मानवीय प्रयास की सफलता है जिसने समय की शुरुआत से दुनिया को बेहतर जानने और बेहतर बनाने की कोशिश की है | यह चंद्रयान उस कांच की बोतल की तरह है जो कोई सन्देश लेकर समुद्र में क्षितिज तक बहती जाती है | यह चंद्रयान उड़ा है, लाखों-करोड़ों लोगों की मेहनत की निशानी लेकर , चाँद तक |

यह मानवीय जिज्ञासा और जिजीविषा की एक कामयाबी है और एक उत्सव भी | मानवता, इन्सान होने का मतलब कहीं न कहीं वो हार न मानने का जज़्बा भी है जिसने इंसानी ज़िन्दगी को अर्थ दिया है | इसी बात को आगे बढ़ाते हुए हम शब्दों के कीमियागर ( अलकेमिस्ट ) गुलज़ार से मिलते हैं जो इंसानी जज्बे के हक़ में पुरज़ोर आवाज़ उठाते हैं | उनका इन्सान मुश्किलों के रास्ते में घबराता नही , बल्कि अपने इन्सान होने के मानी को साबित करने के लिए हर जंग लड़ सकता है, | पूरी कायनात से, और पूरी कायनात के पार खुदा से भी | बड़े से बड़े ख़लीली करिश्मे के आगे ,हादसात के आगे , इंसानी कोशिश की छोटी सी पहल ही काफ़ी है |

उम्मीद और विरोध की बस एक कोशिश, वो कितनी ही छोटी क्यों न हो | ठीक उसी तरह जिस तरह मज़बूत से मज़बूत दीवार में भी जब  एक नन्हा पौधा जब अपनी जड़ें जमाता है तो उसमें दरारें पड़ जाती हैं |  गुलज़ार जैसे शायर की कलम यह इतिहासनामा लिखते हुए धड़क उठती है, जिसमें उनका इन्सान और हमारी इंसानियत जीत जाती है |

चंद्रयान की सफलता के साथ इंसानी नस्ल की हर फ़तह के लिए है यह नज़्म, उनके संग्रह ‘ यार जुलाहे ‘ से | पढ़ें और आनंद लें …

ख़ुदा

पूरे का पूरा आकश घुमा कर बाज़ी देखी मैंने
काले घर में सूरज रख के ,
तुमने शायद सोचा था , मेरे सब मोहरे पिट जायेंगे
मैंने एक चिराग जला कर
अपना रस्ता खोल लिया

तुमने एक समंदर हाथ में ले कर , मुझपर ठेल दिया
मैंने नूह की कश्ती उसके ऊपर रख दी
काल चला तुमने और मेरी जानिब देखा
मैंने काल को तोड़ के लम्हा-लम्हा जीना सीख लिया
मेरी ख़ुदी को तुमने चाँद चमत्कारों से मारना चाहा
मेरे एक प्यादे ने तेरा चाँद का मोहरा मार लिया –

मौत की शाह देकर तुमने सोचा अब तो मात हुई
मैंने जिस्म का खोल उतार के सौंप दिया
और रूह बचा ली

पूरे-का-पूरा आकाश घुमाकर अब तुम देखो बाज़ी |

BP

ख़ुद को पहचानने की ज़रूरत – रूमी के शब्दों में

स्वर्ग वहीँ है , उस दरवाज़े के पार ; पर मैंने चाभी खो दी है ..
शायद मैं बस उसे रखकर भूल गया हूँ ...
- ख़लील जिब्रान
मानवता की सबसे पुरानी जुस्तजू स्वर्ग का दरवाज़ा खोलने की ही रही है , पर हमें वो चाभी शायद इसलिए नहीं मिलती क्योंकि वो हमारे कुछ ज़्यादा ही करीब होती है| स्वर्ग शायद कुछ और नहीं बस अपने सत्य के साथ जीना होता है | और खुद की खोज शायद कुछ और नहीं, बस खुद का निर्माण होती है | यह एक बहुत कठिन यात्रा है और साथ ही साथ बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण भी | अनादिकाल से हमारे कवियों ने, विचारकों खुद जलकर ने स्वतंत्रता और मानवीय अस्मिता की यह राह रौशन रखी है |

अफ़ग़ानिस्तान के बल्ख में 30 सितम्बर 1207 को जन्मे जल्लालुद्दीन बल्की भी इसी प्रकाशयात्रा के प्रकाश वाहक रहे हैं | रूमी के नाम से मशहूर , रूमी ने अपने वक़्त के दरवेश सूफीमत में डूबकर उन्होंने बहुत खूबसूरत नज्में लिखीं | उनकी नज्मों में आशिकी की तड़प , इश्क की दीवानगी और एक संत का तजुर्बा दिखाई पड़ता है | सूफीमत के अनुसार रूमी भी कट्टर परम्पराओं से परे जाकर सच को खुद से छोकर देखने के पक्ष में बोलते थे |खलील जिब्रान ने एक बहुत खूबसूरत और व्यवहारिकता की ज़मीन पर आकर कहा था - ' कई ग्रन्थ खिडकियों क शीशे की तरह होते हैं| हम उनसे सत्य देख तो सकते हैं पर वे हमें सत्य से अलग करते हैं |' रूमी ने हमेशा इस तरह के हर शीशे को तोड़कर सत्य के नज़दीक जाने की नुमाइंदिगी की |

रूमी पुराने मिथ-हास की और लौटते हैं और उन तमाम चमकदार कहानियों को प्रतीकों के रूप में इस्तेमाल करते हैं | हमको भी प्रेरित करते हैं की कहानियों का सीना चीरकर उनके धड़कते दिल को अपनी मुट्ठियों में भर लें , उन चमकदार कहानियों से उनका अर्थ ले लें | अपनी क़िस्मत की इबारत को थोड़ा पढ़ते हुए , थोड़ा लिखते हुए ,इस अथाह समुद्र में गोते लगाते हुए हम अचरज से खुद को भी इन कहानियों के अर्थ से चमकते देखें |





BP

कविता के जादू का करिश्मा- यह कविता मछलियों को स्वस्थ कर देती है

BP

प्रेम का उन्मुक्त आकाश – खलील जिब्रान की एक आदर्श विवाह की परिभाषा

पर अपने इस सामीप्य में अन्तराल को भी स्थान दो 
उनमें स्वर्ग की पवन को नृत्य करने दो ..

...

प्रेम में डूबकर भी स्वतंत्र रह पाना , प्रेम का सबसे बड़ा आदर्श और उसकी सकी सबसे बड़ी विजय है | और किसी से प्रेम करते हुए , उसकी  स्वतंत्रता की रक्षा कर पाना प्रेम की सबसे बड़ी उपलब्धि |जब प्रेम  उद्दीप्त हो उठे -मेरी समझ में यही उसका  एकमात्र सच्चा स्वरुप है |

प्रेम वास्तिविकता के साथ संभावनाओं की भी बात करता है – हम क्या हैं और क्या बन सकते हैं | इसीलिए प्रेम का आदर्श  बस वो आसमान है जिसको प्रेम का वास्तविक अपनी ज़मीन पर निरूपित करना चाहता है | और थोड़ी कोशिश करके , खुद को ऊपर उठाकर उसे एहसास होता है कि यह असंभव नहीं | 

खलील जिब्रान लेबनन के महान लेखक हुए हैं | उन्होंने एक दार्शनिक की तरह कवितायें , गद्य , कहानियां और उपन्यास लिखे हैं | उनकी सबसे प्रसिद्ध कृति है ‘पैगम्बर ‘ | इस किताब में एक गाँव के पैगम्बर अलमुस्तफ़ा गाँव छोड़कर जा रहे हैं | उनको विदा करने आए गाँव के सारे लोग उनसे जीवन के विभिन्न अध्यायों से प्रश्न पूछते हैं | अपने प्रिय पैगम्बर और आम लोगों का यह संवाद ही किताब की शक्ल लेता है | यहाँ खलील जिब्रान ने इंसानी रिश्तों और अंतरंगता पर जो विचार लिखे हैं उनके सौन्दर्य का कोई जोड़ नहीं है |

लेबानीज़ – अमेरिकन लेखक एवं विचारक ,खलील जिब्रान

इससे ख्याल आता है  मनोविज्ञान के उस अंतर्द्वंद्व का जिसे ‘ साही के सिद्धांत’ ( पौर्क्युपिने थ्योरी ) के नाम से जाना जाता है |यह कहता है कि प्रकृति में शीतकाल में ठण्ड से बचने के लिए साहियों के झुण्ड आपस में एक-दूसरे के करीब आ जाते हैं | एक दूसरे की शरीर की गर्मी से वे उष्णता पाते हैं और एक दूसरे के और करीब आते जाते हैं | इतने पास आने पर उनके कांटे एक-दूसरे को गड़ने लगते हैं और जो स्थिति उनके लिए पहले आरामदायक थी अब वही कष्टप्रद होने लगती है | इस पीड़ा से बचने के लिए वे दूर हो जाते हैं पर समस्या अब फिर वही हो जाती है | साथ की गर्माइश न मिलने पर वे फ़िर ठिठुरने लगते हैं और फ़िर करीब आ जाते हैं | और यह सिलसिला चलता जाता है |

यह इंसानी रिश्तों और उनकी नजदीकियों को समझने के लिए एक बहुत सटीक उदहारण है | बहुत पास आने पर , हम सामने वाले की शख्सियत की दरारों और नोकों से ख़ुद चोट खाते हैं और उसको भी चोट पहुंचाते हैं | रिश्तों का प्रेम, सामीप्य का सौन्दर्य तब ही है जब उनमें थोड़ी दूरियां हों |सांस लेने भर की जगह हो, रिश्ते के लिए भी, हमारे लिए भी | 

इसी भाव को रेखांकित करती हुई , पढ़ें खलील जिब्रान की यह रचना जो पैगम्बर का अंश है –

तुमने साथ जन्म लिया है और तुम्हारा साथ अनंतकाल तक का है 
तुम तब भी साथ रहोगे जब मृत्यु के श्वेत पंख तुम्हारे दिवसों को ब्रह्माण्ड में बिखेर देंगे 
हाँ , तुम ईश्वर की स्मृति की विश्रांति में भी साथ रहोगे 
पर अपने इस सामीप्य में अन्तराल को भी स्थान दो 
उनमें स्वर्ग की पवन को नृत्य करने दो ..

एक दूसरे से प्रेम करो , पर प्रेम का कोई अनुबंध मत करो :
अपितु उसे अपनी आत्माओं के तटों के बीच हिलोरें खाता एक समुद्र बनने दो 
एक दूसरे के प्याले भरो , पर एक ही प्याले से अपनी प्यास मत बुझाओ .
एक दूसरे को अपनी रोटी का टुकड़ा दो , पर एक ही रोटी से अपनी भूख मत शांत करो 
साथ में गीत गो और नृत्य करो और आनंद मनाओ , पर एक-दूसरे को अकेला भी रहने दो 
जैसे वीणा के तार भी अकेले होते हैं जब उनमें एक ही संगीत झंकृत होता है 

अपने हृदय दो , पर एक – दूसरे को नहीं 
क्योंकि सिर्फ़ जीवन के हाथ तुम्हारे हृदयों को थाम सकते हैं 
और साथ खड़े होना , पर बहुत करीब नहीं 
क्योंकि देवालय के स्तम्भ भी दूर-दूर  खड़े रहते हैं 
और बलूत और सरू के वृक्ष एक दूसरे की छाया में नहीं उगते ….

जीवन को अर्थ को बेहतर समझने के लिए ‘ द प्रोफेट ‘ ( मसीहा /देवदूत) ज़रूर पढ़ें |

राम्या श्रीराम के ‘द टैप’ से साभार 



( खलील जिब्रान की कविता का अंग्रेजी से अनुवाद - शुभांगी मिश्र )
BP